भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

३०८ श्रीसाम्बपुराणम्

तेजोदानादिदीक्षासु भुवनस्थापितर्पणे।
रथे चास्मिन्महायोगा बाह्यावाचारणावुभौ ॥३५॥

कुश अथवा पुष्प द्वारा समाहित होकर इन सबका अंकन करना चाहिये अथवा विधान के अनुसार पूर्वनिर्दिष्ट विषय की मन ही मन चिन्तना करके परम देवता का पूजन करना चाहिये, जो खखोल्क के नाम से विख्यात हैं। यह नित्य विधि है, अन्य को नैमित्तिक कहा गया है। तेजोदानादि दीक्षा का विषय है। भुवनस्थ आवि तर्पण में इस रथ का महायोग है। दोनों में बाह्य आचरण है। (दीक्षा तथा तर्पण दोनों में बाह्य आचार रहता है)॥३३-३५॥

रथकन्दरवीथ्यास्तु तदर्धगुणसम्मिता।
वीथी कार्या प्रमाणेन द्विगुणा चापरा बहिः ॥३६॥
सा तूद्दिष्टगुणा ग्रीवा चारुणा पद्मतुल्यया।
अलग्ना बाह्यतः कार्या याम्यां दिशि सदासुरः ॥३७॥
द्वारमेतद्विनिर्दिष्टं भिन्नमम्बुजवेश्मनि।
रथस्य बाह्यवीथ्यौ द्वे तस्य दीप्तिः प्रकीर्तिता ॥३८॥
ग्रहदिग्देवताभानोस्तत्रत्या गुणकन्दरा।
द्वारपश्चिमतॊ मोक्षं येन शिष्यान् प्रवेशयेत् ॥३९॥

रथ, कन्दर, वीथी (चत्वर) उसके आधे गुण के समान हैं। बाहर अन्य द्विगुण प्रमाण की वीथी का अंकन करे। यह होगी पूर्वनिर्दिष्ट गुणसम्पन्न पद्मतुल्य चारु ग्रीवा। बाहर विच्छिन्न होगा। दक्षिण दिक् में सर्वदा असुरगण रहेंगे। यह द्वार का वर्णन निश्चित हुआ। इसके अतिरिक्त पद्मगृह में रथ की दो बाहरी वीथी होगी। उसे रथ की दीप्ति कहते हैं। सूर्य के ग्रह दिक् देवगण वहाँ के गुणकन्दर हैं। द्वार के पश्चिम दिक् की ओर मोक्ष है। वहाँ से शिष्यों को प्रवेश कराये॥३६-३९॥

एवं निखिल उद्दिष्टः सूत्रपातविधिक्रमः।
अनेन सम्यग् ज्ञानेन प्राप्नोति परमां गतिम् ॥४०॥
आद्यक्षरेण येन स्याद् ये च लेख्याः सविग्रहाः।
यादृशयश्चरजः पाते विधिस्तत्कथयाम्यहम् ॥४१॥
मणिमुक्ताप्रवालोत्थैर्ब्रीहिधातुसमुद्भवैः।
चूर्णैरग्नीन्द्रमरुद्वर्णैरथ वा चानुपूर्वतः ॥४२॥

इस प्रकार से सभी सूत्रपात का विधिक्रम कह दिया था। इसके सम्यक् ज्ञान से परम गति मिलती है। जिस प्रकार से आद्य अक्षर द्वारा उसे विग्रह के साथ अंकित करना होगा तथा रजःपात की जो विधि है, मैं उसे कहता हूँ। मणि-मुक्ता तथा प्रवालोंत्थित व्रीहि एवं धातु-समुद्भव चूर्ण से अग्नि, इन्द्र तथा मरुद्वर्ण का रथ आनुपूर्वीक होता है॥४०-४२॥