साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
(ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवः)
स्वरावाद्यौ चतुर्थाश्च ऊष्मा च प्रथमं तथा।
चत्वारश्चोत्तरं ज्ञेयास्तृतीयाः स्पर्शसंज्ञकाः ॥१॥
द्वितीयान्तश्चतुष्कश्च उत्तमश्च तथैव तु।
चतुर्थत्रयमेव स्यात्तृतीयो द्वौ तथैव च ॥२॥
द्वितीयाद्यस्य चत्वारस्तृतीयस्यानुनासिकम्।
पञ्चमः प्रथमश्च स्यात्तया स्यादनुनासिकम् ॥३॥
चतुर्थो ह्यष्टकश्चैव योनिः सा हि सुसृष्टये।
चत्वारो स्याद्द्विवर्णाः स्युर्दीपिता बिन्दुभिस्त्रिभिः ॥४॥
आद्यस्वर दो, चतुर्थ वर्णसमूह, ऊष्म वर्णसमूह तथा प्रथम वर्ण—इन चारो को परवर्ती जानना चाहिये। तृतीय वर्ण स्पर्शसंज्ञक हैं। द्वितीयान्त चार हैं, चतुर्थ तीन हैं तथा तृतीय में दो उत्तम हैं। द्वितीय के आद्य चार तथा तृतीय अनुनासिक हैं। इसी प्रकार पञ्चम एवं प्रथम अनुनासिक हैं। चतुर्थ एवं अष्टक सुसृष्टि के योनिरूप हैं और ये चार द्विवर्ण बिन्दुसमूह के साथ दीपित होते हैं॥१-४॥
दीपिनी बीजिनी ह्येषा पावनी स्वरसन्ततिः।
नित्यमेषानुजप्तव्या परं निर्वाणमिच्छता ॥५॥
आहावहवो हवाभवे चारिणी परमशक्तिना।
तन्त्र इति स्थितोभूमिमहाभूत इतरेतरचुम्बचुम्ब-
एषा सिद्धा चत्वारिंशदक्षरा योनिः ॥६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवे
पञ्चमं पटलम् समाप्तम्
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ये स्वरसमूह दीपिनी, बीजिनी तथा पावनी हैं। परनिर्वाण के इच्छुक व्यक्ति को इनका नित्य जप करना चाहिये। अहो! इस संसार में परमशक्ति के साथ विचरणशील परस्पर भिन्न महाभूतों का समूह 'तन्त्र' नामक भूमि में स्थित है। इस प्रकार सिद्ध ४० अक्षरात्मिका योनि सिद्ध होती है॥५-६॥
श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर बीजप्रसव नामक अट्ठावनवें अध्याय का पञ्चम पटल समाप्त
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