भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२३

दाँतों के मूल से लकार तथा चतुर्थ वर्ग (तवर्ग) ओष्ठ तथा दाँतों से उत्पन्न हैं। प्रथम तथा मध्यम (?) ऊष्मवर्ण हैं। ये नपुंसक तथा नासिका से उत्पन्न होते हैं।।१३-१४।।

एते अनादिनिधनस्य सिसृक्षोश्चाव्ययं महत्।
विद्यातन्त्रविवृद्ध्यर्थमेभ्यो योनिं चकार सः॥१५॥

ये सब अनादि निधन सृष्टिकर्त्ता के महत् अव्यय हैं। विद्यातन्त्र की वृद्धि के लिये वे इनसे सृष्टि करते हैं।।१५।।

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः—षोडशस्वराः। क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म—एते स्पर्शाः। य र ल वा अन्तःस्थाः। श ष स हा एते ऊष्माणः। क ख ग घ एते यमाः। नपुंसकाश्च तृतीयेऽध्याये एतत् सिद्धम्।

इति श्रीसाम्बपुराणे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः बीजोत्तरे चतुर्थपटलं समाप्तम्

मूल में लिखित अ से अः तक १६ स्वरवर्ण हैं। ककार से मकार-पर्यन्त स्पर्श वर्ण हैं। य र ल व अन्तःस्थ वर्ण हैं। श ष स—ऊष्म वर्ण हैं। क ख ग घ—यम वर्ण तथा नपुंसक हैं। तृतीय अध्याय में ये सिद्ध हैं।

श्री साम्बपुराणोक्त सत्तावनवें अध्याय में बीजोत्तर का चतुर्थ पटल समाप्त