भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३२२ श्रीसाम्बपुराणम्

ह्रस्वदीर्घप्लुता होते न चोङ्कारसमानजाः । ऋकारक्कवरिवलकाराः स्वरा जिह्वाग्रकारिताः ॥८॥

ये ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुतवर्ण हैं। ये ॐकार के समान उत्पन्न नहीं होते। ऋ, ॠ तथा लृ जिह्वा के अग्रभाग से उत्पन्न हैं॥८॥

इष्टावीषत्प्रविष्टो च संहतो च हनुं यदा। जिह्वा मध्यस्थनानाभ्यां हन्वोरन्तरदर्शनात् ॥९॥

ईषत् प्रविष्ट २ इष्ट जब हनु से बाधा प्राप्त होते हैं, तब जिह्वा के मध्यस्थ तथा नाना (?) से लेकर हनु के मध्य में दर्शन मिलता है॥९॥

ताल्वोरेकारसम्भूतिरकाराद्दग्धसिद्धये । आकारैकारयोरादिरीकाराद्धं च पूर्वशः। तथोङ्कारपरा शेषा एतद्विस्तारलक्षणम्। स्पर्शांश्चाथ प्रवक्ष्यन्ते विद्यातत्त्वस्य सिद्धये ॥१०॥

तालु से ‘ए’कार की उत्पत्ति होती है। यह होती है ‘अ’कार की दग्ध-सिद्धि के लिये (?)। ‘आ’ तथा ‘ऐ’ के आदि तथा पूर्व से ‘ई’कार अर्ध है (?)। इसी प्रकार अवशिष्ट ॐकार के पर है (पश्चात् है), यह है विस्तार का लक्षण। अब विद्या तत्त्व की सिद्धि के लिये स्पर्श वर्ण की बात कहूँगा॥१०॥

जिह्वामूले च हन्वोः स्यात्स्पर्शनं कादिके गणे। मध्ये तालुं स्पृशेद्यञ्च वेष्टयित्वा तृतीयकाः ॥११॥

जिह्वा के मूल में तथा हनुद्वय के मध्य में ककारादि वर्णों का स्पर्श होता है। तृतीय वर्ण ‘ट’ वर्ग में तालु का वेष्टन करके स्पर्श करता है॥११॥

मूर्धन्ये देवतानां च चतुर्थे शिवमूलतः। ओष्ठाभ्यां पञ्चमस्याथ तत्त्वस्पर्शः सबीजकः ॥१२॥

मूर्धन्य का देवताओं तथा शिवमूल से चतुर्थ वर्ग (तवर्ग) का स्पर्श होता है। ओष्ठद्वय से पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का स्पर्श होता है। यह है—बीजों के साथ तत्त्व का स्पर्श॥१२॥

करवन्द्यापात्तस्याहेकैकावद्ववेत्ततः । दन्तमूल्यो लकारः स्याच्चतुर्थश्चोष्ठदन्तगः ॥१३॥ ऊष्माणश्च गतास्ता वै प्रथमा मध्यमास्तथा । नपुंसका भवन्त्येते नासिकाश्च भवन्ति हि ॥१४॥