भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(बीजोत्तरम्)

तत्त्वज्ञानमहं वक्ष्ये बीजान्येतान्यतः परम्।
अनादिनिधनं ज्ञानं गुह्याद्गुह्यतरं च यत्॥१॥
आसीदिदं समग्रं च ततानेतैदजायत।
तस्माद्धर्म वशी कामो जज्ञे व्याहार संप्रति ॥२॥
विवक्षितं त्वहं श्रेष्ठं विवृतं न च संवृतम्।
प्रादुरासीदवर्णेऽस्मात्तस्य संहारमिच्छतः॥३॥
स तमागाच्च जिह्वायां मध्ये प्रकृतिसम्भवः।
इवर्णोवर्णसंहारादुवर्णोऽभून्मनस्ततः ॥४॥

अब तत्त्वज्ञान का वर्णन करता हूँ। तदनन्तर इन बीजों का वर्णन करूँगा। अनादि-निधन ज्ञान गुह्य से भी गुह्यतर है। यह समग्र था, उससे विस्तृत होकर उत्पन्न हुआ (अर्थात् पहले एक में ही निहित था, तदनन्तर उससे विविक्त होकर अनेक रूप में विस्तृत हुआ), उससे धर्म वशीकामना का व्यवहार उत्पन्न होने लगा। बलवान इच्छा का मैंने प्रकाश किया; किन्तु संवृत का नहीं किया। संहार की इच्छा से यह 'अवर्ग' आविर्भूत हुआ। प्रकृति से उत्पन्न होकर उसने जिह्वा में प्रवेश किया। वर्णसंहार से 'इ' वर्ण तथा 'उ' वर्ण उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् मन की उत्पत्ति कही गयी है॥१-४॥

तदन्ते बिन्दुसम्भूतिः सर्वान्तः प्रभु शाश्वतः।
वायोर्निर्धारणात्कण्ठे हकारः सविसर्गकः॥५॥

उसके अन्त में बिन्दु की उत्पत्ति है, जो सबके अन्तर के प्रभु तथा नित्य हैं। वायु-धारणार्थ कण्ठ से विसर्ग के साथ 'ह'कार की उत्पत्ति हुई है॥५॥

अहये चोत्तरे ज्ञेयो वर्णानां सम्भवः स्वयम्।
अवर्णो परयोगे स्यादेकारस्त्वनुलोमतः॥६॥
विलोमतो यकारः स्यात्तधोकारवकारयोः।
तृतीयो योगतो ज्ञेयो व्योकारस्य तु सिद्धये ॥७॥

'अ ह' को उत्तर में जानो (?)। वर्णों की उत्पत्ति अपने-आप होती है। 'अ' वर्ण परयोग से उत्पन्न है, किन्तु 'ए'कार अनुलोम क्रम में एवं विलोम 'ष'कार, 'उ'कार तथा 'व'कार उत्पन्न है। तृतीय योग से व्योकार (वि-उकार) की उत्पत्ति जाननी चाहिये॥६-७॥