भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३१४ श्रीसाम्बपुराणम्

अभिषेककाले तस्याथ ब्राह्मणास्तु यथाक्रमम्। त्रिष्वेतेषु देवेषु त्रिशिक्षां परिपाठयेत् ॥८७॥ अस्य वासोद्वयमिति उदूत्यं च निधापयेत्। आकृष्णेनेति यजुषामष्टौ व्याहृतिकत्रयम् ॥८८॥ आदित्यव्रतसंज्ञं च शुक्लं वस्त्रं च सामसु। सामभिश्चाभिषिञ्चेयुः सर्वे संयतमानसाः ॥८९॥

गुरुदेव कलशों से कुशा से जल लेकर सूर्य की ओर पूर्वाभिमुख शिष्य का अभिषेक कराये। तदनन्तर उसके अभिषेक काल में ब्राह्मणगण यथाक्रमेण तीन शिक्षा (तीन वेद-मन्त्र) का पाठ करें। 'अस्य वासो स्वयं, उदूत्यं च एवं आकृष्णेन' इत्यादि आठ यजुर्मन्त्रों में तीन व्याहृति लगाये। आदित्य व्रत नामक एवं साम (मन्त्र गाने वाले) गायी को शुक्ल वस्त्र प्रदान करे। सभी संयत मन से साममन्त्रों द्वारा अभिषेक करें।।८६-८९।।

ततोऽग्निनिकटं गत्वा मन्त्रेण हृदयेन तु। कुशेन मृज्य तं शिष्यं होमं कुर्याद् गुरुः स्वयम् ॥९०॥ गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं तथा। जातकर्म तथा नामकरणं चाशनक्रियाम् ॥९१॥ चूड़ोपनयनं स्नानपानीयं च क्रतूनपि। कुशेनाङ्गपरामृज्य कुर्याद्वसथे हृदा ॥९२॥

तदनन्तर अग्नि के पास जाकर हृदयमन्त्र से शिष्य की कुश से मार्जना करे। अब गुरुदेव स्वयं होम करें। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण तथा अन्न-प्राशन, चूड़ाकरण, उपनयन में स्नान एवं पानीय (आचमन) ग्रहण करें तथा यज्ञ करें। कुश द्वारा अंगमार्जना करके हृदय गृह में अवस्थान करना उचित है।।९०-९२।।

सकुशेन तु हस्तेन च्छित्वा शिष्यशिखां गुरुः। घृतप्लुतां दहेदग्नौ मूर्द्धादिक्षिप्तकारणात् ॥९३॥ परामृज्याथवा मूर्ध्नि तथैव जुहुयात्कुशान्। पाकसंस्थां हविःसंस्थां होमसंस्थां च कारयेत् ॥९४॥ प्रागुक्तेनैव विधिना ततः शुद्धेन सर्पिषा। शिष्यो होमं प्रकुर्वीत स्रुक्स्रुवाभ्यां यथाक्रमम् ॥९५॥

गुरु कुशयुक्त हाथ से शिष्य की शिखा छिन्न करे। मस्तकादि की क्षिप्तता हेतु घृत से उसे लिप्त करके अग्नि में दग्ध करे अथवा (कुश से) मस्तक की मार्जना करके उसी प्रकार कुशा की अग्नि में आहुति दे। तदनन्तर पाकसंस्था, हरिसंस्था तथा होमसंस्था करायें।।९३-९५।।