भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 424 में से

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पृष्ठ 318

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(मण्डलकथनम्)

यद्यत्स्वर्गापवर्गार्थं यच्च सर्वार्थसाधनम्।
संवत्सराख्यमतुलं मण्डलं कथयामि ते ॥१॥
आचार्यः संयतो धीमानर्कशास्त्रविशारदः।
क्रोधलोभपरित्यक्तो द्विजः शस्तो निरामयः ॥२॥
प्राप्ताभिषेकनिपुणः शास्त्रभक्तो निरामयः।
गुरोर्विधिसमाख्याता ईष्यन्ते परिचारकाः ॥३॥
कुलीनाः शुचयो दान्ता देवद्विजपरायणाः।
एते शिष्याः प्रशंसन्ते रविशासनतत्पराः ॥४॥

सूर्यदेव कहते हैं कि जो स्वर्ग तथा अपवर्ग का निमित्त एवं सर्वार्थ-साधक है, उस संवत्सर नामक अतुलनीय मण्डल का वर्णन तुमसे करता हूँ। इसमें संयत, धीमान्, अर्कशास्त्र-विशारद, जिन्होंने क्रोध तथा लोभ का परित्याग किया है, ऐसे अरोगी ब्राह्मण आचार्य प्रशस्त हैं। जो अभिषिक्त तथा निपुण हैं, शास्त्र के प्रति जिनकी भक्ति है, ऐसे अरोगी, गुरु के विधान में जो अवस्थित हैं, वैसे परिचारक अभीप्सित हैं। जो कुलीन (सत्कुलोत्पन्न) हैं, शुचि, जितेन्द्रिय, देवता तथा ब्राह्मण की सेवा में परायण हैं, सूर्य के शासनपालन में तत्पर हैं, ऐसे शिष्य प्रशंसनीय हैं॥१-४॥

अन्ये ये ये स्युरार्ता वा पापरोगाद्यविप्लुताः।
अप्रजा वसुहीना वा न कुर्युस्तेऽभिषेचनम् ॥५॥
सप्तम्यामुपरागे च संक्रान्तिषु गभस्तिनः।
पुण्येष्वन्येषु वाहस्सु लिखेदर्कोदिते तथा ॥६॥

जो अन्य लोग आर्त हैं, पाप तथा रोगादि द्वारा अभिभूत हैं, पुत्रहीन अथवा धनहीन हैं, उनका कदापि अभिषेक नहीं करना चाहिये। सप्तमी को, ग्रहणकाल में, संक्रान्ति में अथवा सूर्य के अन्य शुभ दिनों में तथा सूर्य के उदयकाल में (मण्डल का) अङ्कन करना चाहिये॥५-६॥

प्रागुद्दिष्टे भुवो भागे सुविस्तीर्णे शुभे शुचौ।
गोभिरध्युषितं कार्यं ब्राह्मणैश्चाभिनन्दितम् ॥७॥
चैद्यकण्टकवल्मीकश्मशानादिविवर्जितम् ।
खखोल्कहृदयेनार्घ्यं दत्त्वा चैतद्विशोधयेत् ॥८॥