भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 424 में से

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पृष्ठ 317

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(अष्टपुष्पिका)

देव उवाच

संक्षेपेण तु देवेश कथयस्वाष्टपुष्पिकाम् ॥१॥

देवगण कहते हैं—हे देवेश! संक्षेप में अष्टपुष्पिका कहिये।।१।।

देव उवाच

खखोल्काय स्वाहा ठः ठः।
ॐकारं स्थापयेत्पूर्वं खकारं वह्निसंयुतम्।
खोकारं दक्षिणे भागे ल्काकारं नैऋते तथा ॥२॥
यकारं पश्चिमे भागे स्वाकारं वायवे ततः।
हाकारमुत्तरे स्थाप्यं तथैशान्यं क्षकारकम् ॥३॥
ओङ्कारेणावाहनं कुर्यात्सान्निध्ये च खमुच्यते।
खोकारं स्थापने विद्याल्काकारं पुष्पकारणात् ॥४॥
स्वाकारं योजयेत् सूक्तं भोज्यं भक्ष्यं तथैव च।
हाकारं च सदा योगी चिन्तयेन्मुक्तिकारणात् ॥५॥

सूर्यदेव कहते हैं—‘खखोल्काय स्वाहा स्वाहा’ (यह सूर्य का मूलमन्त्र है। इसके प्रत्येक अक्षर के बीज न्यास को अष्टपुष्पिका कहते हैं।) इस मन्त्र के पहले ‘ॐ’ लगाना होगा, तदनन्तर वह्नियुक्त ‘ख’, दक्षिण में ‘खो’ नैर्ऋत्य में ‘ल्का’ कार, पश्चिम में ‘य’, वायु-कोण में ‘स्वा’कार, उत्तर में हाकार का स्थापन करके ईशान कोण में ‘क्ष’कार स्थापित करे। ॐकार द्वारा आवाहन करे। सन्निहित करण में ‘ख’ कहना होगा। स्थापन में ‘खो’कार मन्त्र तथा पुष्पदान में ‘ल्का’कार होगा। इस प्रकार भोज्य तथा भक्ष्य दान में ‘स्वा’ का योग होगा। योगी को मुक्ति के लिये सर्वदा ‘हा’कार का चिन्तन करना चाहिये।।२-५।।

क्षकारं तु स्वयं देवमादित्यसमतेजसम्।
विन्यसेद्दक्षिणावर्तं साधको बीजसाधने ॥६॥
ततो मन्त्रान्प्रयुञ्जीत यथान्यायेन साधकः।
बीजाष्टपुष्पिका।
इति श्रीसाम्बपुराणे अष्टपुष्पिकानाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः द्वितीयं पटलम्

‘क्ष’कार स्वयं देवतास्वरूप है। आदित्य का तेज है। बीज-साधना हेतु साधक दक्षिणावर्त्त विन्यास करे। तदनन्तर साधक यथाविधान मन्त्रों को युक्त करे। यही है—बीजाष्टपुष्पिका।।६।।

श्री साम्बपुराणोक्त चौवनवाँ अध्याय का अष्टपुष्पिका नामक द्वितीय पटल समाप्त