साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०० || श्रीसाम्बपुराणम्
तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।
वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत्॥१२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत्।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम्॥१२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम्।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते॥१२३॥
विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है॥१२१-१२३॥
ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दापयेत्॥१२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे॥१२४॥
श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त