साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८५
स्नान कराये। ‘ॐ खखनेत्राय’ इत्यादि वस्त्रदान मन्त्र है। ‘पिङ्गलायाच्छले नमः’ गन्ध मन्त्र है। ‘ॐ हिलि हिलि’ इत्यादि पुष्पदान मन्त्र है। ‘ॐ ज्वलितार्काय नमः’ इत्यादि मन्त्र से धूपदान किया जाता है। ‘ॐ मिहिराय’ इत्यादि मन्त्र से भूषणादि प्रदान करना चाहिये।
मूल में लिखित मन्त्रों से क्रमशः महाश्वेता, दण्डपाणि, अरुणादेवी, पिङ्गला, अरुण, सूर्य, अंशुमाली, धाता, इन्द्र, रवि, गभस्ति, यम, स्वर्णरिता, त्वष्टा, मित्र तथा विष्णु का पूजन करे। ये आदित्य गणों के मन्त्र हैं।
मूल में लिखित ‘ॐ हरिकेशाय’ इत्यादि मन्त्रों से क्रमशः हरिकेश, रथकृच्छ्र, रथौजा, पुञ्जिकस्थला, क्रतुस्थला, विश्वकर्मा, रथस्वन, रथचित्र, मेनका, सहजन्या, विश्वव्यचा, रथप्रोता, अंशमाठर, प्रम्लोचन्ती, अनुम्लोचन्ती, तार्क्ष्य, अरिष्टनेनि, विश्वाची, घृताची, अर्वाग्वसु, सेनजित्, सुषेण, उर्वशी तथा पूर्वचिति का पूजन करना चाहिये। यह सब रश्मिपति तथा अप्सराओं का मन्त्र है।
‘ॐ प्रदीप्ताननाय नमः’ इत्यादि मन्त्रों से प्रदीप्तासन, कुमार, घृणीश, अङ्गावह, विराज, केशी, सुरराज, अरिष्ट, माष, अनन्त, निक्षुभ तथा तेजोवहा का पूजन करे। यह सब गणाधिपों का मन्त्र है।
तत्पश्चात् ‘ॐ क्षुपायै नमः’ इत्यादि मन्त्रों द्वारा मातृगण का पूजन कर्तव्य है। क्षुपा, मैत्री, प्रेमा, श्यामा, रोचि, दीप्ति तथा सुवर्चला का पूजन करे, जो मातृगण हैं।
‘ॐ चन्द्राय हुं नमः’ इत्यादि मन्त्र से चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु, केतु तथा बुध ग्रहों का पूजन करे।
तत्पश्चात् मूल में अंकित मन्त्रों से दिक् देवतागण का पूजन करे। जो जिसके अधिपति हैं, उनके साथ उसका उल्लेख करके पूजन करना चाहिये। जैसे—‘इन्द्राय सुराधिपतये नमः—देवताओं के अधिपति इन्द्र को नमस्कार, तेज के अधिपति अग्नि को नमस्कार इत्यादि। ऐसे ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, शङ्कर, ब्रह्मा तथा शेष (अनन्त) को नमस्कार किया जाता है।
अब ‘ॐ तेजोऽधिपतये नमः’ इत्यादि मूल में अंकित मन्त्रों से दीप तथा नैवेद्य प्रदान करे। ‘ॐ जलकुन्दलाय’ इत्यादि आतोद्य मन्त्र है। ‘ॐ अंशुमते’ इत्यादि पूजा, जप एवं न्यास मन्त्र हैं।
ॐ नमस्ते दिव्यरूपाय सर्वभूतात्मने नमः।
सर्वतेजोऽधिपतये भानवे लोकचक्षुषे ॥११४॥
मूल में अंकित श्लोक ११४ द्वारा सूर्यदेव की स्तुति करे। अर्थ है—हे दिव्य रूप! आपको नमस्कार है। हे समस्त प्राणीगण के आत्मरूप! आपको नमस्कार है। हे समस्त तेज के अधिपति! लोकचक्षुस्वरूप भानु! आपको नमस्कार है॥११४॥