साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८५
स्नान कराये। ‘ॐ खखनेत्राय’ इत्यादि वस्त्रदान मन्त्र है। ‘पिङ्गलायाच्छले नमः’ गन्ध मन्त्र है। ‘ॐ हिलि हिलि’ इत्यादि पुष्पदान मन्त्र है। ‘ॐ ज्वलितार्काय नमः’ इत्यादि मन्त्र से धूपदान किया जाता है। ‘ॐ मिहिराय’ इत्यादि मन्त्र से भूषणादि प्रदान करना चाहिये।
मूल में लिखित मन्त्रों से क्रमशः महाश्वेता, दण्डपाणि, अरुणादेवी, पिङ्गला, अरुण, सूर्य, अंशुमाली, धाता, इन्द्र, रवि, गभस्ति, यम, स्वर्णरिता, त्वष्टा, मित्र तथा विष्णु का पूजन करे। ये आदित्य गणों के मन्त्र हैं।
मूल में लिखित ‘ॐ हरिकेशाय’ इत्यादि मन्त्रों से क्रमशः हरिकेश, रथकृच्छ्र, रथौजा, पुञ्जिकस्थला, क्रतुस्थला, विश्वकर्मा, रथस्वन, रथचित्र, मेनका, सहजन्या, विश्वव्यचा, रथप्रोता, अंशमाठर, प्रम्लोचन्ती, अनुम्लोचन्ती, तार्क्ष्य, अरिष्टनेनि, विश्वाची, घृताची, अर्वाग्वसु, सेनजित्, सुषेण, उर्वशी तथा पूर्वचिति का पूजन करना चाहिये। यह सब रश्मिपति तथा अप्सराओं का मन्त्र है।
‘ॐ प्रदीप्ताननाय नमः’ इत्यादि मन्त्रों से प्रदीप्तासन, कुमार, घृणीश, अङ्गावह, विराज, केशी, सुरराज, अरिष्ट, माष, अनन्त, निक्षुभ तथा तेजोवहा का पूजन करे। यह सब गणाधिपों का मन्त्र है।
तत्पश्चात् ‘ॐ क्षुपायै नमः’ इत्यादि मन्त्रों द्वारा मातृगण का पूजन कर्तव्य है। क्षुपा, मैत्री, प्रेमा, श्यामा, रोचि, दीप्ति तथा सुवर्चला का पूजन करे, जो मातृगण हैं।
‘ॐ चन्द्राय हुं नमः’ इत्यादि मन्त्र से चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु, केतु तथा बुध ग्रहों का पूजन करे।
तत्पश्चात् मूल में अंकित मन्त्रों से दिक् देवतागण का पूजन करे। जो जिसके अधिपति हैं, उनके साथ उसका उल्लेख करके पूजन करना चाहिये। जैसे—‘इन्द्राय सुराधिपतये नमः—देवताओं के अधिपति इन्द्र को नमस्कार, तेज के अधिपति अग्नि को नमस्कार इत्यादि। ऐसे ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, शङ्कर, ब्रह्मा तथा शेष (अनन्त) को नमस्कार किया जाता है।
अब ‘ॐ तेजोऽधिपतये नमः’ इत्यादि मूल में अंकित मन्त्रों से दीप तथा नैवेद्य प्रदान करे। ‘ॐ जलकुन्दलाय’ इत्यादि आतोद्य मन्त्र है। ‘ॐ अंशुमते’ इत्यादि पूजा, जप एवं न्यास मन्त्र हैं।
ॐ नमस्ते दिव्यरूपाय सर्वभूतात्मने नमः।
सर्वतेजोऽधिपतये भानवे लोकचक्षुषे ॥११४॥
मूल में अंकित श्लोक ११४ द्वारा सूर्यदेव की स्तुति करे। अर्थ है—हे दिव्य रूप! आपको नमस्कार है। हे समस्त प्राणीगण के आत्मरूप! आपको नमस्कार है। हे समस्त तेज के अधिपति! लोकचक्षुस्वरूप भानु! आपको नमस्कार है॥११४॥
२८६ श्रीसाम्बपुराणम्
अग्निक्रिया ततो वक्ष्ये मन्त्रमुद्रादितः क्रमात्। उल्लेखनं धारणं तु कुर्यादर्कहृदस्तथा ॥१९५॥ तदनन्तर अग्निक्रिया कहता हूँ। तदनन्तर क्रमपूर्वक मन्त्र मुद्राप्रभृति का उल्लेखन तथा सूर्य का हृदय में धारण करना चाहिये॥१९५॥
आज्येन व्रीहिभिः पक्वैर्कस्य कुसुमैश्च वा। प्रत्येकमाहुतीर्दद्याद्घे पूज्याः परिकीर्तिताः ॥१९६॥ सूर्य की यहाँ जो पूजा कही गयी है, उनमें प्रत्येक में घृत, पके गेहूँ-यवादि अथवा कुसुम के द्वारा आहुति देनी चाहिये॥१९६॥
ॐ संहर संहर विरोचन ठः ठः—उपसंहारमन्त्रः। ॐ शांतात्मने सर्वलोकप्रियाय ठः ठः—शुद्धिमन्त्रः। ॐ खखोल्काय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात्—नमस्कारविद्यावार्कहृदयेन दानः। गच्छागच्छ स्ववर्गेण द्वादशादित्यविग्रहम्। ॐ हिलि हिलि गच्छ देव यथागतः स्वाहा—विसर्जनमन्त्रः। ॐ चण्डपिङ्गलाय ठः ठः—निर्माल्यमन्त्रः।
ॐ संहर संहर विरोचन स्वाहा—यह उपसंहार मन्त्र है। ॐ शान्तात्मने सर्वलोकप्रियाय स्वाहा—शुद्धिमन्त्र है। 'ॐ खखोल्काय विद्महे' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्र से नमस्कार विधान द्वारा सूर्यहृदय में (नमस्कार को) दान करे। 'गच्छागच्छ' इत्यादि मन्त्र से विसर्जन करना चाहिये। ॐ चण्डपिङ्गलाय स्वाहा—यह निर्माल्य मन्त्र है।
एतद्यः प्रत्यहं कुर्याद्रविवासर एव च। सकृद्वा यो विधानं च तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१९७॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यं बलं तेजो यशस्तथा। पुत्रान् प्राप्नोत्यपुत्रश्च सूर्यलोकं स गच्छति ॥१९८॥
जो प्रतिदिन, रविवार को अथवा एक बार भी इस विधान का पालन करते हैं, उनकी पूजा के फल सुनो। वे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, बल, तेज तथा यश प्राप्त करते हैं। अपुत्रक को पुत्र प्राप्त होता है और वह सूर्यलोक में (मरणोपरान्त) जाता है॥१९७-१९८॥
अष्टपुष्टिकाविधिः
देवा ऊचुः अर्के कार्या सदा भक्तिः सर्वकालमतन्द्रितैः। आचार्यस्य गुरूणां च रविशास्त्रविदां तथा ॥१९९॥
अब अष्टपुष्टिका विधि कहते हैं। देवगण कहते हैं—सर्वकाल में आलस्य छोड़कर सूर्य की भक्ति करना उचित है। इसी प्रकार आचार्य की, गुरुगण की तथा सूर्यशास्त्र जानने वालों की भी भक्ति करना उचित है॥१९९॥
पञ्चम्यां तु हविर्भुक्त्वा सायं दशनधावनम्।
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८७
पञ्चम्यां तु हविर्भुक्त्वा सायं दशनधावनम्।
भक्षयित्वा तु गृह्णीयाद् व्रतं नियमपूर्वकम्॥१२०॥
व्यायामं मैथुनक्रोधामत्स्यं मांसं च गृञ्जनम्।
हिंसामधुशिलापृष्ठनिवृत्तं कांस्यभोजनम्॥१२१॥
उदक्याः स्पर्शनं तैलं सर्वनिर्माल्यलङ्घनम्।
षष्ठ्यान्तु वर्जनीयानि सप्तम्यां चैव दीक्षितः॥१२२॥
पञ्चमी के दिन घृत खाकर सायंकाल दाँत साफ करके भक्षण करके नियमपूर्वक व्रत करे। व्यायाम, मैथुन, क्रोध, मत्स्य, मांस, विषाक्त पशुमांस, लहसुन-भक्षण, हिंसा, मधु, शिलापृष्ठ पर लगा तथा कांस्य पात्र में भोजन निषिद्ध है। रजस्वला स्त्री का स्पर्श, तैल, सकल निर्माल्य लंघन—इन सबका षष्ठी तथा सप्तमी को सूर्यपूजा में दीक्षित व्यक्ति परित्याग करे॥१२०-१२२॥
सकलो निष्कलः सूर्य इत्युक्तं हि त्वया विभो।
सकलं निष्कलं चैव समाख्यातुमिहार्हसि॥१२३॥
हे विभु! सूर्य सकल तथा निष्कल हैं, यह आपने कहा है। अतः सकल एवं निष्कल सूर्य के विषय में आपका ही बतलाना उचित है॥१२३॥
देव उवाच
सकलो निष्कलश्चैव यथा सूर्यः प्रकीर्तितः।
कथ्यमानं मया सर्वं निबोधत तथा सुरा॥१२४॥
निर्व्यापारं तथा भूतमासीत्सर्वमिदं जगत्।
निद्रोहममलं ज्ञानं निरानन्दं निरात्मकम्॥१२५॥
अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं चेति यमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥१२६॥
सूर्यदेव कहते हैं—मैं यह बतलाता हूँ कि सूर्य को सकल तथा निष्कल क्यों कहा गया है। हे देवगण! सुनो। यह समस्त जगत् निर्व्यापार, निर्द्रोह, अमल, ज्ञानरूप, निरानन्द एवं निरात्मक था। जो अव्यक्त कारण है, वह नित्य है। सत् एवं असदात्मक है। तत्त्वविद्गण उसे प्रधान एवं पुरुष कहते हैं॥१२४-१२६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं तु सर्वार्थं देवशक्यं सनातनम्॥१२७॥
यमाहुः सर्वभूतानां परमं कारणं महत्।
अयमाद्यमजं सूक्ष्मं त्रिगुणप्रभवाव्ययम्॥१२८॥
यमाहुः पुरुषं श्रेष्ठं परमं परमेश्वरम्।
२८८ श्रीसाम्बपुराणम्
येनात्मना सर्वमिदं जगद्व्याप्तं चराचरम्॥१२९॥
वह गन्ध-स्पर्श-रसरहित तथा शब्द-स्पर्शविवर्जित है। जगत् की योनि सर्वार्थ है। देवगण की शंका भी सनातन है। जिनको सभी प्राणीगण का परम महत् कारण कहा गया है, वह आद्य, अज, सूक्ष्म, त्रिगुण-स्वरूप, प्रभव (जिससे सब उत्पन्न होता है) एवं अव्यय भी है। उसे श्रेष्ठ पुरुष परमपरमेश्वर कहते हैं। इस आत्मस्वरूप से ही सचराचर जगत् व्याप्त है॥१२७-१२९॥
जगत्सृष्टिक्षयाव्यक्तश्चोदितः स तदा स्वयम्।
महदादिगुणैर्युक्तस्तेजोरूपसमन्वितः ॥१३०॥
अव्यक्तं कारणं यत्तदुद्दिष्टं त्रिगुणात्मकम्।
स्वयमेकाग्रमापन्नं खखोल्कमिति तत्स्मृतम्॥१३१॥
योगमास्थाय परमं स देवः सर्वतत्त्ववित्।
ततः प्रजाः स्रष्टुमनाः ससर्ज सलिलं पुनः॥१३२॥
जगत् की सृष्टि, क्षय तथा अव्यक्त रूप से वे स्वयं कथित हैं। महदादि गुणों से युक्त तथा तेजोरूप से समन्वित हैं। जिनको अव्यक्त कारण कहा गया है, जो त्रिगुणात्मक हैं, जो एकाग्रतापन्न हैं, उन्हें खखोल्क (सूर्य) कहते हैं। जो देव सर्वतत्त्व के वेत्ता हैं, उन्होंने परम-योग का साहाय्य लेकर प्रजा-सृष्टि की कामना से जल की सृष्टि किया॥१३०-१३२॥
आप एकार्णवे चैव यदस्यायतनङ्गतः।
नारास्ताः सृष्टिकरणे तेन नारायणस्तु सः॥१३३॥
एकार्णवे ततस्तस्मिन्निर्विभागे समन्ततः।
नारायणः खखोल्कोऽसौ सुष्वाप सलिले रविः॥१३४॥
दिव्यं शतसहस्रं च वत्सराणां तदाम्भसि।
तेजोरूपेण महता न्यस्य सत्सलिले स्वयम्॥१३५॥
एकार्णव में जल, जो इनका आयतन (गृह) था, वे सब नर जिसके आश्रित हैं, उनको नारायण कहा जाता है। तदनन्तर चारो ओर निर्विभाग रूप उस एकार्णव जल में खखोल्क सूर्यरूपी नारायण शयन कर रहे थे। तब दिव्य शत-सहस्र वर्ष जल में महान् तेजोरूप उन्होंने निवास किया॥१३३-१३५॥
ततः काले व्यतीते तु कृत्वा त्वण्डं हिरण्मयम्।
आत्मानं सृष्टवांस्तत्र नैकशक्तिसमन्वितः ॥१३६॥
खखोल्क इति चाख्यातस्तत्रैकः संप्रकाशकः।
विराट् यः पुरुषश्चान्यः ख्यातो ब्रह्मेति चापरः॥१३७॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८९
पञ्चानां तु सुखादीनां कारणं हि यतः स्मृतः।
खखोल्क इति तेनासौ निगमज्ञैरुदाहृतः ॥१३८॥
तदनन्तर बहुत समय पश्चात् हिरण्मय अण्ड का निर्माण करके वहाँ अनेक शक्ति-समन्वित होकर उन्होंने अपनी सृष्टि किया। वे खखोल्क नाम से प्रसिद्ध थे। वे एक प्रकाशकस्वरूप थे। ‘विराट्’ संज्ञा से अपर पुरुष के रूप में वे ही ख्यात हुये। ये अपर पुरुष ही ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध हैं; क्योंकि ये पञ्च सुखों के हेतु हैं। इसीलिये वेदज्ञ विद्वान् इनको खखोल्क कहते हैं॥१३६-१३८॥
हिरण्येन च गर्भस्थो यस्मादेष समावृतः।
हिरण्यगर्भ इत्येवं तस्मात् स तु निगद्यते ॥१३९॥
बृहत्वाद्वृंहणत्वाद्वा ब्रह्माऽसौ परिकीर्तितः।
पुरे प्रतिष्ठितत्वाच्च पुरुषत्वमुपागतः ॥१४०॥
यह गर्भस्थ स्थिति में स्वर्ण (हिरण्य) द्वारा घिरे हुये थे, अतएव इनको हिरण्यगर्भ कहा जाता है। बृहत्तम तथा सर्वव्यापक होने के कारण इनको ब्रह्मा कहते हैं। पुर (देह) में प्रतिष्ठित होने के कारण ही इनकी प्रसिद्धि ‘पुरुष’ नाम से हुई॥१३९-१४०॥
देवेषु च महादेवो महादेवस्ततः स्मृतः।
सदेशत्वाच्च लोकानामवश्यत्वान्महेश्वरः ॥१४१॥
याति यस्मात्प्रजाः सर्वा प्रजापतिरिति स्मृतः।
स्वयं बभूव पूर्णत्वात्स्वयम्भूरिति विश्रुतः ॥१४२॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रभुक्।
सहस्रबाहुः प्रथमः पुरुषोऽसौ निगद्यते ॥१४३॥
देवों में इनको महान् कहा जाता है, अतः ये महादेव हैं। सभी लोकों के शासनकर्त्ता तथा अन्य के वश में न आने वाले होने के कारण इनको महेश्वर कहते हैं। समस्त प्राणीगण इनसे ही उत्पन्न हैं, अतएव ये प्रजापति कहलाते हैं। परिपूर्ण तथा स्वयंजात होने के कारण इनको स्वयम्भू कहा जाता है। सहस्र मस्तक-विशिष्ट पुरुष, जिनके हजारो पैर हैं, जो सहस्र भोक्ता, सहस्र बाहुयुक्त हैं; इसीलिये इनको पुरुष भी कहा गया है (यहाँ सहस्र शब्द असंख्यवाचक है)॥१४१-१४३॥
यत्किञ्चिद्दृश्यते लोके तेजोरूपं प्रकाशकम्।
खखोल्क इति तत्सर्वं निर्दिष्टं लोककारणम् ॥१४४॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
विज्ञानमात्रमव्यक्तं तमाहुः कारणं परम् ॥१४५॥
साम्ब०—१९
२९० श्रीसाम्बपुराणम्
इस जगत् में जो कुछ तेजोरूप प्रकाशक वस्तु परिलक्षित हो रही है, वह सब खखोल्क है। ये लोक के हेतु हैं। वे सभी उपाधि से मुक्त हैं। नित्य, सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं। विज्ञानस्वरूप तथा अव्यक्त होने के कारण ही इनको 'कारण' कहा गया है।।१४४-१४५।।
अव्यक्तात्प्रकृतिर्जज्ञे महांस्तु सदसद्गुणः।
महत्तत्त्वादहङ्कारस्तस्मात् सर्वेन्द्रियाणि च॥१४६॥
इन्द्रियाणि च तन्मात्रं सन्निवेश्यात्मनि प्रभुः।
सृष्टवान्सर्वभूतानि खखोल्कः पुरुषः प्रभुः॥१४७॥
अव्यक्त से प्रकृति उत्पन्न है। महान् सत् तथा असत् गुणयुक्त है। महत्तत्त्व से अहंकार तथा अहंकार से इन्द्रियाँ उत्पन्न हैं। समस्त इन्द्रिय तथा तन्मात्रा को अपनी आत्मा में सन्निविष्ट करके प्रभु ने समस्त प्राणियों की सृष्टि की है। अतः खखोल्क पुरुष तथा प्रभु हैं (सबके नियन्ता हैं)।।१४६-१४७।।
खखोल्कात्कारणाद्यस्मादव्यक्तान्तं चतुर्विधम्।
जगद् व्यक्तं समुत्पन्नं विकारैर्महदादिभिः॥१४८॥
स यदा मनसा सार्धं संयोगमधिच्छति।
तदा ही सर्वभूतानां प्रवृत्तिरुपजायते॥१४९॥
आत्मनो दिवसस्यान्ते सर्वकर्मात्मनः स्वयम्।
यः समारोप्यात्मसुखं तेजोराशिः स्वपीत्यसौ॥१५०॥
कारणस्वरूप खखोल्क से अव्यक्तान्त चतुर्विध व्यक्त जगत् महदादि विकार द्वारा समुत्पन्न हुआ है। जब वे मन के साथ संयुक्त हो गये (मन से संकल्प किया) तब समस्त प्राणियों में प्रवृत्ति की उत्पत्ति हो गयी। अपने दिन के अन्तिम भाग में अपने समस्त कर्म का स्वयं में समापन करके आत्मसुख में वे तेजोराशि (सूर्य) शयन करते हैं।।१४८-१५०।।
प्रतिबुद्धः पुनरसौ महाभूतादिभिः सह।
करोति सर्गं स तदा गुणत्रयसमन्वितम्॥१५१॥
एवंविधश्च सप्ताश्वः सहस्रकिरणो ह्यसौ।
सृजति ग्रसते चैव जगत्सर्वं चराचरम्॥१५२॥
तपति प्रकाशते चैव स च गर्जति वर्षति।
स एव तोयस्य पतिः संस्तृतो वडवानलः॥१५३॥
कालाग्निरुद्रो विख्यातः स च स्यान्नीललोहितः।
सर्वतेजोऽधिपो योगी महांल्लोकश्च स स्मृतः॥१५४॥
एकपञ्चाशतमोऽध्यायः २९१
पुनः वे जाग्रत् होकर महाभूतों (पञ्चमहाभूत) के साथ त्रिगुणात्मिका सृष्टि रचते हैं। इस प्रकार सात अश्वों से युक्त सहस्रकिरण सूर्य सचराचर जगत् की सृष्टि करते हैं एवं पुनः उसका ग्रास (संहार) कर देते हैं। वे ताप देते तथा प्रकाश करते हैं। वे ही गर्जनयुक्त वर्षण करते हैं। वे ही जल के पति तथा बड़वानलों के रचयिता भी हैं। वे कालाग्नि रुद्र नाम से ख्यात हैं। वे ही नीललोहित हैं। समस्त तेज के अधिपति, योगी तथा महान् पुरुष हैं॥१५१-१५४॥
अनादिनिधनो ब्रह्माऽक्षरश्चाक्षर एव च।
तस्मात्परतरो नास्ति देवानमपि दैवतम्॥१५५॥
तेन सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
सर्वात्मानं च तं यान्ति प्रलये समुपस्थिते॥१५६॥
संतापयति लोकांस्त्रींश्चित्रभानुः स्वरश्मिभिः।
वर्षाणां सर्वकामानां पर्जन्य इति स स्मृतः॥१५७॥
वे अनादिनिधन (जिनका आदि भी नहीं है, अन्त भी नहीं है), क्षररहित अक्षर ब्रह्म हैं। उनसे परतर कोई भी नहीं है। वे देवताओं के भी देवता हैं। उनके द्वारा सृष्ट इस समस्त स्थावर-जंगमात्मक जगत् का प्रलय उपस्थित होने पर वे सर्वात्मस्वरूप में प्रवेश कर जाते हैं। चित्रभानु (सूर्य) अपनी रश्मि के द्वारा तीनों लोकों को सन्तप्त करते हैं। समस्त कामनाओं का वर्षण करने के कारण उनको 'पर्जन्य' कहा गया है॥१५५-१५७॥
तेजोरूपेण महता बाह्यतश्चापि तेन वै।
युगान्तवह्निना सर्वमिदं ब्रह्माण्डमावृतम्॥१५८॥
उनके महान् तेज के कारण बाह्यतः दिखाई देने वाली, युग को अन्त करने वाली अग्नि से यह समस्त ब्रह्माण्ड घिरा हुआ है॥१५८॥
संहारकाले च जगद्भुक्त्वा संवर्तकोऽनलः।
भस्मीकरोति त्रैलोक्यं द्वादशादित्यरूपकैः॥१५९॥
स्वर्गधारणाविद्यातः संहारान्नकरोति सः।
ब्रह्मा विष्णुः खखोल्कः सरूपकैर्जगतः क्रमात्॥१६०॥
उद्यन् स पूर्वदिग्भागे गच्छंश्चापि स पश्चिमे।
मेरु-प्रदक्षिणं कुर्वन् जगत्सर्वं प्रकाशते॥१६१॥
संहारकाल में संवर्तक अनल होकर वे द्वादश आदित्यरूप से त्रिभुवन को भस्म कर देते हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु तथा खखोल्क रूप से क्रमशः जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा विनाश करते हैं। वे पूर्व दिग् भाग में उदित होकर पश्चिम दिशा के अन्त में जाते-जाते मेरु की प्रदक्षिणा करके समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं॥१५९-१६१॥
२९२ श्रीसाम्बपुराणम्
सर्वभूतशरीराणि यस्मादावृत्य तिष्ठति। अरुणः कीर्तितस्तेन देवोऽसौ सर्वलोकधृक् ॥१६२॥ शश्वच्च जायते यस्माच्छश्वत् संतिष्ठते च यत्। यस्मात् स वै स्मृतः सूर्यो निगमज्ञैर्मनीषिभिः ॥१६३॥ अंशवः किरणाः प्रोक्ताः स्मृतस्तेनांशुमानिति। ऐश्वर्यं परमं तस्य वशगाश्च सुरासुराः ॥१६४॥
वे समस्त प्राणिगण के शरीर को आवृत्त करके अवस्थान करते हैं। अतएव वे अरुण कहे जाते हैं। वे देव समस्त लोकों को धारण करते हैं। वे निरन्तर उत्पन्न होते हैं तथा निरन्तर अवस्थित रहते हैं। इसीलिये उन्हें सूर्य कहा गया है। उनके अंश को किरण कहा जाता है। अतएव सूर्य को अंशुमान कहते हैं। उनका परम ऐश्वर्य है। इसीलिये देवता तथा असुरगण सब उनके वश में हैं।।१६२-१६४।।
इदीति परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततः स्मृतः। अवतीमांस्तु लोकांस्त्रीन् यस्मादेष परिभ्रमन् ॥१६५॥ अवेति रक्षणे धातुस्तस्मात् स च रविः स्मृतः। गभस्तिभिः समायोगाद् गभस्तिदेव उच्यते ॥१६६॥
‘इदि’ धातु परम ऐश्वर्य के अर्थ में प्रयुक्त होती है। इसीलिये उनको इन्द्र कहा गया है। ये परिभ्रमण करके तीनों लोकों का पालन करते हैं। ‘अव्’ धातु का प्रयोग रक्षा के अर्थ में किया जाता है। इसलिये इनको रवि कहते हैं। किरणों (गभास्ति) के समायॊग के कारण ये ‘गभस्तिदेव’ कहे गये हैं।।१६५-१६६।।
संयच्छते यतः सर्वान् यमस्तेन स उच्यते। प्रजाः संसृजतो रेतः स्वर्णमस्याद्रवत् पुरा। सुवर्णरेतास्ततो देवैः कीर्तितोऽसौ दिवाकरः ॥१६७॥ सृजत्येष प्रजास्त्वष्टो यस्मात्त्वष्टा ततः स्मृतः। त्वष्टृत्वेनापि यत्सर्वमौषधीष्वेव यः स्थितः ॥१६८॥
सबको संयत करने के कारण ये ‘यम’ हैं। पूर्व में प्रजागण की सृष्टि के समय इनका सुवर्णमय रेत स्खलित हुआ। अतः इनको सुवर्णरेता कहा जाता है। विश्वकर्मारूपेण प्रजागण की ये सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा जाता है। त्वष्टृत्वरूप से (सूत्रधारण रूप से) सभी औषधियों में ये ही अवस्थित हैं।।१६७-१६८।।
स्नेहेन सर्वभूतानि यस्माद् भजति भास्करः। बन्धुभूतो हि जगतो मित्रस्तेन स कीर्तितः ॥१६९॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९३
यस्माज्जातमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः। प्रवेशनात्पालनाच्च विष्णुस्तेन स कीर्तितः॥१७०॥ प्रणवेन समायुक्तः सप्तबीजः स्मृतस्तु सः। मूलमन्त्रं खखोल्कस्य देवस्यामिततेजसः॥१७१॥
भास्कर स्नेहवशात् समस्त प्राणियों का भजन करते हैं। समस्त जगत् के बन्धु-स्वरूप हैं। अतः इनको मित्र कहा गया है। आदित्य रश्मियों द्वारा इस जगत् के सब कुछ को उत्पन्न करते हैं। उनके प्रवेश तथा पालन के कारण वे 'विष्णु' नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रणवयुक्त सप्तबीज अमित तेजस्वी खखोल्क का मूल मन्त्र कहा गया है—ॐ खखोल्काय स्वाहा॥१६९-१७१॥
प्रणवो दीपकस्तस्य मकारः साम्प्रदायिकः। स्वाहाकारनमस्कारौ कुर्यात्पूजा पदे स्थितौ॥१७२॥ वर्णत्रयं तु यच्छेषं खखोल्क इति संज्ञितम्। तन्महाभूतभेदैस्तु भिद्यते पञ्चधा पुनः॥१७३॥ खकारः खं विनिर्दिष्टं सूर्यत्वात् पार्थयोगतः। अनादिनिधनं शुद्धं तस्य शब्दं गुणं विदुः॥१७४॥
प्रणव उनका दीपक है। मकार साम्प्रदायिक है। स्वाहा एवं नमः शब्द पूजनकाल में व्यवहृत होता है। शेष तीन वर्ण 'खखोल्क'—यह सूर्य का नाम है। वह महाभूत के भेद से पुनः पाँच प्रकार का हो जाता है। खकार शब्द आकाश का निर्देश करने वाला है। पार्थयोग से सूर्य अनादि निधन, शुद्ध हैं। शब्द उनका गुण कहा गया है॥१७२-१७४॥
सज्जनात्सर्जनाच्चैव ककारो वायुरुच्यते। स्पर्शस्तस्य गुणो ज्ञेयः पूर्वश्वासविकारतः॥१७५॥ ओरस्तेजो विज्ञेयं तच्च रूपगुणं स्मृतम्। विकारात्पूर्वयोगश्च तद्गुणाभ्यां च संशयः॥१७६॥ लपनात्प्रलयाच्चैव लकारो वरुणः स्मृतः। रसेन पूर्वैश्च गुणैरप्युक्तत्वाच्चतुर्गुणः॥१७७॥ ककारा संस्मृता पृथ्वी पित्र्यागम्यगुणा तु सा। पूर्वैश्चतुर्भिश्श्च गुणैर्युक्ता पञ्चगुणा भवेत्॥१७८॥
सज्जन (सुजात) तथा सर्जन (सृष्टि) के कारण 'क' शब्द को वायु कहा गया है। उसका गुण है—स्पर्श। पूर्वश्वास विकार से उसे समझा जाता है (?)। ओकार को तेज जानना चाहिये। वह रूप का गुण है। विकार-हेतु को पूर्वयोग और उसके गुण द्वारा जाना जाता है (?)। लपन (मुख) तथा प्रलय हेतु 'ल'कार शब्द से वरुण को कहा जाता है।
२९४ श्रीसाम्बपुराणम्
रस तथा पूर्वगुणों के द्वारा इसे चतुर्गुण कहते हैं। ककार शब्द पृथ्वी का वाचक है। वह पृथिवी पिता का गुण (गन्ध) प्राप्त करती है तथा पूर्व के चार गुण (शब्द-स्पर्श रूप-रस) से युक्त होकर पञ्चगुण-विशिष्ट हो जाती है॥१७५-१७८॥
खखोल्क इति यत्प्रोक्तं महाभूतानि पञ्च तत्।
प्राणाद्या वायवः पञ्च तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥१७९॥
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव सत्त्वाद्यास्तद्गुणास्त्रयः।
मनोबुद्धिरहङ्कार इत्येतदपरत्रयम्॥१८०॥
खखोल्कानीति बीजानि चोक्तान्येकोनविंशतिः।
षड्विंशकेतनासञ्च सर्वव्याप्तमनेन तु॥१८१॥
खखोल्क = पञ्चमहाभूत, प्राणादि पञ्चवायु तथा बुद्धि, इन्द्रियाँ एवं पाँच कर्मेन्द्रिय तथा उनके सत्त्वादि तीन गुण, मन-बुद्धि-अहंकार। इस प्रकार खखोल्क एवं १९ बीज कहे गये। २६ चिह्नों द्वारा सब कुछ इसी से व्याप्त है॥१७९-१८१॥
स एव देव उत्पाद्यानुष्ठाद्यात्मानमात्मना।
सर्वं करोति जगतः पालनं प्रलयं तथा॥१८२॥
आदित्यः सततं नाम तपत्येष मरीचिभिः।
वह्निः सहस्रकिरणवृत्तं कुम्भनिभं स्मृतम्॥१८३॥
नदीनदसमुद्रेभ्यः सर्वेभ्यः सलिलं ह्यसौ।
किरणानां सहस्रेण समादत्ते सदा रविः॥१८४॥
वे देव स्वयं ही स्वयं को उत्पन्न करके तथा अनुष्ठान करके जगत् का पालन-प्रलयादि सब कुछ करते हैं। आदित्य निरन्तर अपनी किरणों से ताप प्रदान करते हैं। अग्नि को सहस्र किरण वृत्त कुम्भतुल्य कहा गया है। सभी नद-नदी तथा समुद्र से रवि अपनी किरणों से जल खींचते रहते हैं, संग्रह करते रहते हैं॥१८२-१८४॥
अस्तकाले खखोल्कस्य प्रभापादेन पावकम्।
समाविशति सूर्यं च दिवा तच्चापि पावकः॥१८५॥
एवमेतद्भवेद्धेतुः परस्परनिवेशनात्।
प्राकाश्यमौष्णवृत्तिं च कुरुते हि दिवानिशि॥१८६॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष देवो महेश्वरः।
ऋचो यजूंषि सामानि एष एव न संशयः॥१८७॥
अस्तगमन काल में खखोल्क की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। दिन में अग्नि उसे सूर्य को प्रदान करते हैं। परस्पर निवेशन के फल का यही कारण है।
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९५
ये दिन-रात प्रकाश तथा उष्णता देते हैं। ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही हैं— ऋक्, यजुः तथा साम। इस विषय में कोई सन्देह नहीं है॥१८५-१८७॥
उद्यन् स दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्तथा। सामभिश्चैव सायाह्ने भास्करः प्रतपत्यसौ ॥१८८॥ त्रीणि रश्मीनि तस्यैव भूलोकन्द्योतयन्त्यधः। चत्वारि तु पितॄंस्तिर्यक् त्रीण्येवोर्ध्वसुरालयम् ॥१८९॥
उदयकाल में सूर्य ऋक् समूह द्वारा दीप्ति प्राप्त करते हैं। मध्याह्न में यजुःसमूह द्वारा तथा सन्ध्याकाल में सामसमूह द्वारा भास्कर ताप प्रदान करते हैं। उनकी तीन रश्मि भूलोक तथा अधःलोक को प्रकाशित करती है। चार रश्मि पितृलोक को तथा तीन तिर्यक् रश्मि ऊर्ध्व देवलोक को आलोकित करती है॥१८८-१८९॥
सुषुम्नो हरिवेशश्च विश्वकर्मा तथैव च। विश्वव्यचा पुनश्चान्यः संयद्वसुरथापरः ॥१९०॥ उदावसुः पुनश्चान्यः पुरोऽन्यः परिकीर्तितः। रवेः करसहस्राद्धि सप्तश्रेष्ठास्तु रश्मयः ॥१९१॥ एवं हि रश्मिभिर्देवो जगत्सर्वं प्रकाशते। तथा वर्द्धयति क्षीणं क्रमतोऽयं निशाकरम् ॥१९२॥ एवं हि स्वल्प उद्दिष्टः सर्वव्यापी दिवाकरः। अध्वरैर्विविधैः पुण्यैरीज्योऽसौ पापनाशनः ॥१९३॥
सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, उदावसु तथा पुर—ये सूर्यकिरणों में से सात श्रेष्ठ रश्मियाँ हैं। सूर्यदेव इन रश्मियों द्वारा समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं तथा क्रमश क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करते हैं। यहाँ कुछ सामान्य रूप से कहा गया दिवाकर विश्वव्यापी है। पापनाशक दिवाकर पुण्यरूप विविध यज्ञों द्वारा पूजित होते हैं॥१९०-१९३॥
तस्य तावत्खखोल्कस्य महाध्वरविधिं शुभम्। शृणुष्वाख्यायमानं वै पश्चाच्छ्रोष्यथ निष्कलम् ॥१९४॥ नमः सवित्रे देवाय समीहितफलप्रदः। अदीक्षितस्तु यः कश्चिदिदन्तन्त्रं विचारयेत् ॥१९५॥ स कुष्ठी भवति क्षिप्रं प्रेत्येह नरकं व्रजेत्।
इन खखोल्क के मंगलकारी महायज्ञों की विविध कथा कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर निष्कल की बात सुनना। देव सविता को नमस्कार है, जो सम्यक् रूप से पूजित होकर
२९६ | श्रीसाम्बपुराणम्
फल देते हैं। अदीक्षित व्यक्ति इस तन्त्र का विचार (कर्म) करने पर कुष्ठरोगी होता है तथा शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है; साथ ही नरकगामी भी होता है॥१९४-१९५॥
आर्जवे कुलसम्पन्ने शीलधर्मरते सदा ॥
दातव्यं सूर्यभक्ताय प्रज्ञावति जितेन्द्रिये ॥१९६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ग्रहादिदेवपूजनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सरल, सत् कुलोत्पन्न, सर्वदा धर्मरत, प्राज्ञ, जितेन्द्रिय सूर्यभक्त को ही यह विद्या प्रदान करनी चाहिये॥१९६॥
श्री साम्बपुराणोक्त ग्रहादि देवपूजा नामक इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त
प्रथमं शोधयेद् भूमिं स्थानानि च यथाविधि।
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
(साधनरहस्यम्)
अहं चेदं प्रवक्ष्यामि रहस्यं ज्ञानमुत्तमम्।
उक्तं भगवता भानो रहस्यं च प्रकाशकम् ॥१॥
प्रथमं शोधयेद् भूमिं स्थानानि च यथाविधि।
वर्णांश्चानुक्रमं कृत्वा वसुधां च विशोधयेत् ॥२॥
ततोऽधिवासयेद् देवं न्यासेन सकलीकृतम्।
मण्डलं च समालिख्य आचार्यः सुसमाहितः ॥३॥
अब मैं गोपनीय उत्तम ज्ञान का वर्णन करता हूँ, जिसे भगवान् (सूर्यदेव) द्वारा कहा गया है और जो सूर्यरहस्य-विषयक तथा प्रकाशक है। प्रथमतः भूमि तथा स्थान का यथाविधि शोधन करना चाहिये। अनुक्रम में वर्णों का विन्यास करके भूमि-शोधन करना चाहिये। तदनन्तर न्यास के द्वारा सकलीकृत देवता का अधिवास करके आचार्य को सुसमाहित होकर मण्डल अंकित करना चाहिये॥१-३॥
एकान्ते स नदीतीरे तीर्थेष्वायतनेषु च।
उद्यानकुसुमाकीर्णे चित्रप्रासादसङ्कुले ॥४॥
आकाशतलके चापि यत्र वा रोचते मनः।
पूर्वात्मावेशने चैव भूदेशे दोषवर्जिते ॥५॥
विप्रस्य वसुधा शुक्ला लोहिता क्षत्रियस्य तु।
पीता वैश्यस्य विज्ञेया कृष्णा शूद्रस्य कीर्तिता ॥६॥
निर्जन में, नदीतीर में, तीर्थ स्थान, गृह, उद्यान के कुसुम से भरे स्थान में, विचित्र प्रासाद समूह में, आकाश के नीचे अथवा जहाँ मन की प्रेरणा हो, पूर्व आवेशन में (सूर्यादि की परिधि स्थान में) तथा दोषवर्जित भूप्रदेश में मण्डल अंकित करना चाहिये। ब्राह्मण की भूमि शुभ्र, क्षत्रिय की रक्तवर्ण, वैश्य की पीतवर्ण तथा शूद्र की कृष्णवर्ण कही गयी है॥४-६॥
चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः।
ततः शब्दं निरीक्ष्येह माङ्गल्यांश्चापि वाचकान् ॥७॥
प्रशस्तं वचनं ग्राह्यमप्रशस्तं विवर्जयेत्।
आज्यमध्ववलिप्तेन हन्याज्जतुफलेन तु ॥८॥
२९८ श्रीसाम्बपुराणम्
यथावत् आनुपूर्वीक चार वर्ण की शब्दपरीक्षा करके माङ्गल्यवाचक प्रशस्त वचन ग्रहणीय है तथा अप्रशस्त वर्जनीय है। घृत तथा मधु से लिप्त अतुफल (जिसके फल से दलबद्ध पतङ्गसमूह आविर्भूत होते हैं, ऐसे गूलर के फल) से आहुति प्रदान करनी चाहिये॥७-८॥
ततः सूत्रान्यसेन् मन्त्री यथावदनुपूर्वशः।
सिन्दूरिकानसुचनग्रन्थिस्त्येन विवर्जितान्॥९॥
कार्पासिकान् बल्कल्यान्क्षौमान् कौशिकपट्टकान्।
यथाहस्तविभागेन पातयन्मन्त्रवत्समम्॥१०॥
ऐन्द्रे च प्रथमं सूत्रं हृदयेनाभिमन्त्रितम्।
ततश्चाष्टदले पद्ममध्ये तस्य नियोजयेत्॥११॥
तदनन्तर मन्त्री यथावत् आनुपूर्वीक सूत्र का विन्यास करे। सिन्दूर वर्ण के तथा सिले वस्त्र का वर्जन करके कपास का वस्त्र, वल्कलवस्त्र, सिल्क या कौशिकवस्त्र—इनमें से किसी एक का एक हाथ वस्त्र मन्त्रज्ञ साधक पूर्व की ओर प्रथम सूत्र को हृदय द्वारा अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर अष्टदल पद्म से उसे युक्त करे॥९-११॥
गायत्र्या लब्धहस्तं तु चिन्तयित्वा दिवाकरम्।
याति चित्तरजाः प्राज्ञो जपेच्चैव षडक्षरम्॥१२॥
सत्वं रजस्तमश्चेति हितं राजसलक्षणम्।
अङ्गुष्ठपर्वविपुलं रजः सर्वत्र कथ्यते॥१३॥
अतिक्षीणं तथा स्थूलं कृशं बिन्दुविवर्जितम्।
आलिखेन्मण्डलं दिव्यं चतुर्द्वारं सुशोभनम्॥१४॥
गायत्री द्वारा अपने हस्त में प्राप्त दिव्य हाथ का चिन्तन करे। चित्त का मालिन्य हट जाने पर प्राज्ञ व्यक्ति (षडक्षर) सूर्यमन्त्र का जप करे। सत्व-रज तथा तम हैं—राजस चिह्न। अंगुष्ठपर्व के बराबर स्थूल रजःगुण सर्वत्र रहता है। अति तीक्ष्ण, स्थूल, कृशबिन्दु, चतुर्द्वारयुक्त सुशोभन दिव्य मण्डल अंकित करे॥१२-१४॥
आयुधानि तथा चाष्टौ दिशासु विदिशासु च।
पूर्वपत्रे तथोङ्कारे पश्चिमे तु खकारकम्॥१५॥
खोकारं दक्षिणे पत्रे ल्काकारं चोत्तरे तथा।
यकारः वायुभागे तु स्वाकारं वह्निसंस्थितम्॥१६॥
हकारं नैऋते योज्यं क्षेमेशान्यां तथा दिशि।
कर्णिकायां तथा देवं महातेजो द्विरक्षरम्॥१७॥
इस प्रकार दिक् तथा विदिक् में आठ आयुध अंकित करे। पूर्वपत्र में ओंकार, पश्चिम में 'ख'कार, दक्षिण में 'खो'कार तथा उत्तर में 'ल्का'कार अंकित करे। इसी प्रकार
द्विपञ्चाशतमोऽध्यायः २९९
वायुकोण में (पश्चिम उत्तर कोण में) 'य'कार, अग्निकोण में (पूर्व-पश्चिम कोण में) 'स्वा', नैर्ऋत्य-ईशान कोण में 'हा' अंकित करे (अर्थात् ॐ खखोल्काय स्वाहा)। कर्णिका में महातेजा दो अक्षर विशिष्ट देवता का (?) अङ्कन करे।।१५-१७।।
तस्य वै हृद्गतां देवीं विन्यसेच्छुतसंस्थिताम्।
अष्टौ वर्ज्या निशा देव्या दिशासु विदिशासु च ।।१८।।
पूर्णप्राकारमध्ये कवर्गः पञ्चभूतमहानि च।
दक्षिणे षकारवर्गः पञ्चबुद्धीन्द्रियाणि च ।।१९।।
पश्चिमे टकारवर्गः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च।
उत्तरे तकारवर्गः पञ्चतन्मात्राणि च।
ऐशान्यां पकारवर्गमव्यक्तं च तथाहितम् ।।२०।।
उसके हृद्गत श्वेत संस्थित देवी का अङ्कन करे (यहाँ श्वेत संस्थित का तात्पर्य श्वेत पद्मसंस्थित प्रतीत होता है) तथा निशा देवी को छोड़कर दिक्-विदिकू में आठ जन को स्थापित करे। पूर्व प्राकार के मध्य में 'क'वर्ग तथा पञ्चभूत महत्तत्त्व, दक्षिण में 'ष'कार वर्ग तथा पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पश्चिम में 'ट'कार वर्ग तथा पञ्च कर्मेन्द्रियगण, उत्तर में 'स'कार वर्ग एवं पञ्चतन्मात्रा एवं ईशानकोण में अव्यक्त 'प'कार वर्ग का विन्यास करे।।१८-२०।।
आग्नेय्यां चकारवर्गं बुद्धिं च। नैर्ऋत्यां वकारवर्गमहं च। वायव्यां कोऽहं कोऽहं क्षौंमनश्चेति। द्वितीये प्राकारे—सुरेन्द्रं पूर्वे आग्नेय्यां अग्निम्। याम्ये यमम्। नैर्ऋत्ये निर्ऋत्याधिपम्। पश्चिमे वरुणम्। वायव्ये वायुम्। सौम्ये सोमम्। ऐशान्यामीशानम्। मुद्रालक्षणं घटेत इति। तृतीये प्राकारे—चाशनि तथा शक्तिदण्डं खड्गं चक्रं गदां परशुं च पुनर्लिखेत्। तथापरं चैव महामुद्रा दातव्या दिशि विदिशि। पूर्वादारभ्य लोकपालानावाहयेत्। चतुर्थे त्वावरणे—व्योमपुष्पं बलिमुपहारांश्च गृह्णीतवति। ॐङ्कारादि स्वाहान्ताः। ततोऽग्निस्थापनं कृत्वा। आर्य उष्णिफ् कृतभूषणः। भूमिं उल्लिख्यालिख्य धृतदर्भमवकीर्य ब्राह्मणं दक्षिणतः स्थाप्य स्रुवपात्रं विशोध्य आज्यं प्रदक्षिणीकृत्य दक्षिणं जानुभूभौ निपात्य स्रुवमुपागृह्य अभुक्तपात्रः षड़ाहुतीर्जुहुयात्। सान्निध्यकरणं सम्भवति एतादृशलक्षणमग्निं सञ्चिन्त्य छागारूढं प्रादेशमात्रं सप्तार्चिः कुण्डाक्षधरं पिङ्गलश्मश्रुलोचनम् स्वमन्त्रेणाह्वयेत्। ततः शिष्यस्य गर्भाधानाद्याः पञ्चपञ्चाहुतीर्जुहुयात्। ततो दण्डं मेखलां स्थापयेत्। पूर्वतोमुखं प्रवेशयेत्सूर्यभक्तान् हृदये नाभिमन्त्रितान्।
अग्निकोण में 'च'कार वर्ग एवं बुद्धि, नैर्ऋत्य में 'व'कार वर्ग तथा अहंतत्त्व, वायुकोण में कोहं कोहं क्षौं तथा मन। द्वितीय प्राकार में—पूर्व में इन्द्र, अग्निकोण में अग्नि, दक्षिण में यम, नैर्ऋत्य में नैर्ऋत्य के अधिपति, पश्चिम में वरुण, वायुकोण में वायु, उत्तर में सोम, ईशानकोण में ईशान इस प्रकार से मुद्रालक्षण होगा।
३०० | श्रीसाम्बपुराणम्
तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।
वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः ।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत् ॥२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत् ।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम् ॥२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम् ।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते ॥२३॥
विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है॥२१-२३॥
ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दापयेत्॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशतमोऽध्यायः
तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे॥२४॥
श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त
प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
(पूजाविधिनिरूपणम्)
नारद उवाच
प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।
तन्मध्ये चिन्तयेद्देवं भास्करं रश्मिविग्रहम् ॥१॥
सहस्रदिनसंस्कारं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
महातेजोमयं ध्यात्वा आदित्यं पूजयेद् बुधः ॥२॥
योऽयं हरितवर्णाभं रथे तिष्ठति वाजिनम्।
अरुणः सारथिर्यस्य रथवाहः स्वयं स्थितः ॥३॥
तमहं लोकशांत्यर्थमादित्यमाह्वयाम्यहम् ।
आयाहि भगवन्भानो तव यज्ञः प्रवर्तते ॥४॥
प्रथमतः कर्णिकायुक्त अष्टपत्र-विशिष्ट पद्म का चिन्तन करे। उसमें रश्मिस्वरूप सूर्यदेव का चिन्तन करना चाहिये। सहस्र दिनसंस्कारक (असंख्य दिनों को प्रकाशित करने वाले) कोटि सूर्य प्रभातुल्य महातेजोमय आदित्य का ध्यान करके पण्डितगण उनका पूजन करते हैं। जो हरित वर्ण वाले अश्वों के रथ पर स्थित हैं, रथ के सारथी अरुण जिस रथ पर हैं, लोक की शान्ति के लिये मैं उन आदित्य का आवाहन करता हूँ। हे भगवन् भानु! आप आईये। आपका यज्ञ प्रारम्भ होता है॥१-४॥
इदमर्घ्यं च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः।
आह्वानं सहस्रकिरणं स्वागतं स्वागतं स्वागतं ठः ठः।
ॐ धर धर अद्य ॥५॥
यह अर्घ्य तथा पाद्य ग्रहण करिये। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सहस्रकिरणों से युक्त आपका मैं आह्वान करता हूँ। आपका स्वागत है (मूल में लिखित मन्त्र से पाद्य अर्घ्य प्रदान करे, यथा—इदमर्घ्यञ्च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः (यह अर्घ्य तथा पाद्य मन्त्र है)। आवाहन मन्त्र है—आह्वानं·······धर धर अद्य ।।५।।
वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्य उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ॥६॥
स्वाहा धूपः गन्य गन्यादि ठः ठः गन्यः। ॐ दीपपञ्जालिनि ठं ठं दीपः।
३०० || श्रीसाम्बपुराणम्
तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।
वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत्॥१२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत्।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम्॥१२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम्।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते॥१२३॥
विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है॥१२१-१२३॥
ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दापयेत्॥१२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे॥१२४॥
श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त
प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्।
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
(पूजाविधिनिरूपणम्)
नारद उवाच
प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्।
तन्मध्ये चिन्तयेद्देवं भास्करं रश्मिविग्रहम् ॥१॥
सहस्रदिनसंस्कारं सूर्यकोटिसमप्रभम्।
महातेजोमयं ध्यात्वा आदित्यं पूजयेद् बुधः ॥२॥
योऽयं हरितवर्णाभं रथे तिष्ठति वाजिनम्।
अरुणः सारथिर्यस्य रथवाहः स्वयं स्थितः ॥३॥
तमहं लोकशांत्यर्थमादित्यमाह्वयाम्यहम्।
आयाहि भगवन्भानो तव यज्ञः प्रवर्त्तते ॥४॥
प्रथमतः कर्णिकायुक्त अष्टपत्र-विशिष्ट पद्म का चिन्तन करे। उसमें रश्मिस्वरूप सूर्यदेव का चिन्तन करना चाहिये। सहस्र दिनसंस्कारक (असंख्य दिनों को प्रकाशित करने वाले) कोटि सूर्य प्रभातुल्य महातेजोमय आदित्य का ध्यान करके पण्डितगण उनका पूजन करते हैं। जो हरित वर्ण वाले अश्वों के रथ पर स्थित हैं, रथ के सारथी अरुण जिस रथ पर हैं, लोक की शान्ति के लिये मैं उन आदित्य का आवाहन करता हूँ। हे भगवन् भानु! आप आईये। आपका यज्ञ प्रारम्भ होता है।।१-४।।
इदमर्घ्यं च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः।
आह्वानं सहस्रकिरणं स्वागतं स्वागतं स्वागतं ठः ठः।
ॐ धर धर अद्य ॥५॥
यह अर्घ्य तथा पाद्य ग्रहण करिये। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सहस्रकिरणों से युक्त आपका मैं आह्वान करता हूँ। आपका स्वागत है (मूल में लिखित मन्त्र से पाद्य अर्घ्य प्रदान करे, यथा—इदमर्घ्यञ्च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः (यह अर्घ्य तथा पाद्य मन्त्र है)। आवाहन मन्त्र है—आह्वानं······धर धर अद्य।।५।।
वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ॥६॥
स्वाहा धूपः गन्ध गन्धादि ठः ठः गन्धः। ॐ दीपपञ्जलिनि ठं ठं दीपः।
३०० श्रीसाम्बपुराणम्
तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।
वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत् ॥२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत्।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम् ॥२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम्।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते ॥२३॥
विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है।।२१-२३।।
ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दाप- येत्॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे।।२४।।
श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त