साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८८ श्रीसाम्बपुराणम्
येनात्मना सर्वमिदं जगद्व्याप्तं चराचरम्॥१२९॥
वह गन्ध-स्पर्श-रसरहित तथा शब्द-स्पर्शविवर्जित है। जगत् की योनि सर्वार्थ है। देवगण की शंका भी सनातन है। जिनको सभी प्राणीगण का परम महत् कारण कहा गया है, वह आद्य, अज, सूक्ष्म, त्रिगुण-स्वरूप, प्रभव (जिससे सब उत्पन्न होता है) एवं अव्यय भी है। उसे श्रेष्ठ पुरुष परमपरमेश्वर कहते हैं। इस आत्मस्वरूप से ही सचराचर जगत् व्याप्त है॥१२७-१२९॥
जगत्सृष्टिक्षयाव्यक्तश्चोदितः स तदा स्वयम्।
महदादिगुणैर्युक्तस्तेजोरूपसमन्वितः ॥१३०॥
अव्यक्तं कारणं यत्तदुद्दिष्टं त्रिगुणात्मकम्।
स्वयमेकाग्रमापन्नं खखोल्कमिति तत्स्मृतम्॥१३१॥
योगमास्थाय परमं स देवः सर्वतत्त्ववित्।
ततः प्रजाः स्रष्टुमनाः ससर्ज सलिलं पुनः॥१३२॥
जगत् की सृष्टि, क्षय तथा अव्यक्त रूप से वे स्वयं कथित हैं। महदादि गुणों से युक्त तथा तेजोरूप से समन्वित हैं। जिनको अव्यक्त कारण कहा गया है, जो त्रिगुणात्मक हैं, जो एकाग्रतापन्न हैं, उन्हें खखोल्क (सूर्य) कहते हैं। जो देव सर्वतत्त्व के वेत्ता हैं, उन्होंने परम-योग का साहाय्य लेकर प्रजा-सृष्टि की कामना से जल की सृष्टि किया॥१३०-१३२॥
आप एकार्णवे चैव यदस्यायतनङ्गतः।
नारास्ताः सृष्टिकरणे तेन नारायणस्तु सः॥१३३॥
एकार्णवे ततस्तस्मिन्निर्विभागे समन्ततः।
नारायणः खखोल्कोऽसौ सुष्वाप सलिले रविः॥१३४॥
दिव्यं शतसहस्रं च वत्सराणां तदाम्भसि।
तेजोरूपेण महता न्यस्य सत्सलिले स्वयम्॥१३५॥
एकार्णव में जल, जो इनका आयतन (गृह) था, वे सब नर जिसके आश्रित हैं, उनको नारायण कहा जाता है। तदनन्तर चारो ओर निर्विभाग रूप उस एकार्णव जल में खखोल्क सूर्यरूपी नारायण शयन कर रहे थे। तब दिव्य शत-सहस्र वर्ष जल में महान् तेजोरूप उन्होंने निवास किया॥१३३-१३५॥
ततः काले व्यतीते तु कृत्वा त्वण्डं हिरण्मयम्।
आत्मानं सृष्टवांस्तत्र नैकशक्तिसमन्वितः ॥१३६॥
खखोल्क इति चाख्यातस्तत्रैकः संप्रकाशकः।
विराट् यः पुरुषश्चान्यः ख्यातो ब्रह्मेति चापरः॥१३७॥