साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८७
पञ्चम्यां तु हविर्भुक्त्वा सायं दशनधावनम्।
भक्षयित्वा तु गृह्णीयाद् व्रतं नियमपूर्वकम्॥१२०॥
व्यायामं मैथुनक्रोधामत्स्यं मांसं च गृञ्जनम्।
हिंसामधुशिलापृष्ठनिवृत्तं कांस्यभोजनम्॥१२१॥
उदक्याः स्पर्शनं तैलं सर्वनिर्माल्यलङ्घनम्।
षष्ठ्यान्तु वर्जनीयानि सप्तम्यां चैव दीक्षितः॥१२२॥
पञ्चमी के दिन घृत खाकर सायंकाल दाँत साफ करके भक्षण करके नियमपूर्वक व्रत करे। व्यायाम, मैथुन, क्रोध, मत्स्य, मांस, विषाक्त पशुमांस, लहसुन-भक्षण, हिंसा, मधु, शिलापृष्ठ पर लगा तथा कांस्य पात्र में भोजन निषिद्ध है। रजस्वला स्त्री का स्पर्श, तैल, सकल निर्माल्य लंघन—इन सबका षष्ठी तथा सप्तमी को सूर्यपूजा में दीक्षित व्यक्ति परित्याग करे॥१२०-१२२॥
सकलो निष्कलः सूर्य इत्युक्तं हि त्वया विभो।
सकलं निष्कलं चैव समाख्यातुमिहार्हसि॥१२३॥
हे विभु! सूर्य सकल तथा निष्कल हैं, यह आपने कहा है। अतः सकल एवं निष्कल सूर्य के विषय में आपका ही बतलाना उचित है॥१२३॥
देव उवाच
सकलो निष्कलश्चैव यथा सूर्यः प्रकीर्तितः।
कथ्यमानं मया सर्वं निबोधत तथा सुरा॥१२४॥
निर्व्यापारं तथा भूतमासीत्सर्वमिदं जगत्।
निद्रोहममलं ज्ञानं निरानन्दं निरात्मकम्॥१२५॥
अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं चेति यमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥१२६॥
सूर्यदेव कहते हैं—मैं यह बतलाता हूँ कि सूर्य को सकल तथा निष्कल क्यों कहा गया है। हे देवगण! सुनो। यह समस्त जगत् निर्व्यापार, निर्द्रोह, अमल, ज्ञानरूप, निरानन्द एवं निरात्मक था। जो अव्यक्त कारण है, वह नित्य है। सत् एवं असदात्मक है। तत्त्वविद्गण उसे प्रधान एवं पुरुष कहते हैं॥१२४-१२६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं तु सर्वार्थं देवशक्यं सनातनम्॥१२७॥
यमाहुः सर्वभूतानां परमं कारणं महत्।
अयमाद्यमजं सूक्ष्मं त्रिगुणप्रभवाव्ययम्॥१२८॥
यमाहुः पुरुषं श्रेष्ठं परमं परमेश्वरम्।