भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२८६ श्रीसाम्बपुराणम्

अग्निक्रिया ततो वक्ष्ये मन्त्रमुद्रादितः क्रमात्। उल्लेखनं धारणं तु कुर्यादर्कहृदस्तथा ॥१९५॥ तदनन्तर अग्निक्रिया कहता हूँ। तदनन्तर क्रमपूर्वक मन्त्र मुद्राप्रभृति का उल्लेखन तथा सूर्य का हृदय में धारण करना चाहिये॥१९५॥

आज्येन व्रीहिभिः पक्वैर्कस्य कुसुमैश्च वा। प्रत्येकमाहुतीर्दद्याद्घे पूज्याः परिकीर्तिताः ॥१९६॥ सूर्य की यहाँ जो पूजा कही गयी है, उनमें प्रत्येक में घृत, पके गेहूँ-यवादि अथवा कुसुम के द्वारा आहुति देनी चाहिये॥१९६॥

ॐ संहर संहर विरोचन ठः ठः—उपसंहारमन्त्रः। ॐ शांतात्मने सर्वलोकप्रियाय ठः ठः—शुद्धिमन्त्रः। ॐ खखोल्काय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात्—नमस्कारविद्यावार्कहृदयेन दानः। गच्छागच्छ स्ववर्गेण द्वादशादित्यविग्रहम्। ॐ हिलि हिलि गच्छ देव यथागतः स्वाहा—विसर्जनमन्त्रः। ॐ चण्डपिङ्गलाय ठः ठः—निर्माल्यमन्त्रः।

ॐ संहर संहर विरोचन स्वाहा—यह उपसंहार मन्त्र है। ॐ शान्तात्मने सर्वलोकप्रियाय स्वाहा—शुद्धिमन्त्र है। 'ॐ खखोल्काय विद्महे' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्र से नमस्कार विधान द्वारा सूर्यहृदय में (नमस्कार को) दान करे। 'गच्छागच्छ' इत्यादि मन्त्र से विसर्जन करना चाहिये। ॐ चण्डपिङ्गलाय स्वाहा—यह निर्माल्य मन्त्र है।

एतद्यः प्रत्यहं कुर्याद्रविवासर एव च। सकृद्वा यो विधानं च तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१९७॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यं बलं तेजो यशस्तथा। पुत्रान् प्राप्नोत्यपुत्रश्च सूर्यलोकं स गच्छति ॥१९८॥

जो प्रतिदिन, रविवार को अथवा एक बार भी इस विधान का पालन करते हैं, उनकी पूजा के फल सुनो। वे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, बल, तेज तथा यश प्राप्त करते हैं। अपुत्रक को पुत्र प्राप्त होता है और वह सूर्यलोक में (मरणोपरान्त) जाता है॥१९७-१९८॥

अष्टपुष्टिकाविधिः

देवा ऊचुः अर्के कार्या सदा भक्तिः सर्वकालमतन्द्रितैः। आचार्यस्य गुरूणां च रविशास्त्रविदां तथा ॥१९९॥

अब अष्टपुष्टिका विधि कहते हैं। देवगण कहते हैं—सर्वकाल में आलस्य छोड़कर सूर्य की भक्ति करना उचित है। इसी प्रकार आचार्य की, गुरुगण की तथा सूर्यशास्त्र जानने वालों की भी भक्ति करना उचित है॥१९९॥