भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२० श्रीसाम्बपुराणम्

वह मित्र वायुभक्षण करता है और वह बन्धु के समान चक्षु में स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं।।२१।।

अनुगृह्णन् सदा भक्तान् वरैर्नानाविधैस्तु सः।
एवमाद्यमिदं स्थानं पश्चात् साम्बेन निर्मितम् ।।२२।।

वे सर्वदा नानाविध वरों से भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। यही है—सूर्य का आदि स्थान (चन्द्रभागा नदी का तट); जिसका निर्माण साम्ब ने कराया था।।२२।।

तत्र मित्रस्थितो यस्मात् तस्मान्मित्रवनं स्मृतम्।
एवं द्वादशभिस्तेन सवित्रा परमात्मना ।।२३।।

मित्र जहाँ अवस्थान करते हैं, उसे मित्रवन कहा गया है। इस प्रकार से सविता द्वादश मूर्तियों में स्थित हैं।।२३।।

इत्येवं द्वादशादित्यं जगद् ज्ञात्वा तु मानवः।
नित्यं श्रुत्वा पठित्वा च सूर्यलोके महीयते ।।२४।।

इति श्रीसाम्बपुराणे द्वादशमूर्त्युपाख्यानं नाम चतुर्थोऽध्यायः

मनुष्यस्वरूप द्वादश आदित्य लोक को जानकर, नित्य सुनकर तथा पाठ करके साधक सूर्यलोक में पूजनीय हो जाता है।।२४।।

श्री साम्बपुराण का द्वादश मूर्त्ति-वर्णन नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त