साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः
(मित्रवरुणयोस्तपः)
बृहद्वल उवाच
यदि तावदसौ सूर्यश्चादिदेवः सनातनः।
तत् किमर्थं तपस्तेपे वरैस्तु प्राकृतो यथा ॥१॥
बृहद्वल जिज्ञासा करते हैं—यदि सूर्य सनातन आदिदेव हैं, तब वर-प्राप्ति हेतु प्राकृत व्यक्ति के समान उन्होंने तप क्यों किया?॥१॥
वशिष्ठ उवाच
एतत्तेऽहं प्रवक्ष्यामि परं गुह्यं विभावसोः।
पुरा मित्रेण यत् प्रोक्तं नारदाय महात्मने ॥२॥
ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—सूर्य के इस परम रहस्य की कथा तुमसे कहता हूँ। पहले मित्र ने महात्मा नारद से इसे कहा था॥२॥
प्राङ् मयोक्ताश्च यास्तुभ्यं रवेर्द्वादशमूर्त्तयः।
मित्रश्च वरुणश्चोभौ तासां तु तपसि स्थितौ ॥३॥
पहले मैंने तुमसे सूर्य की जिस द्वादश मूर्ति की कथा कही है, उनमें से मित्र तथा वरुण तपस्या में लगे थे॥३॥
अब्भक्षौ वरुणस्ताभ्यां तस्थौ पश्चिमसागरे।
मित्रो मित्रवने चास्मिन् वायुभक्षोऽचरत्तपः ॥४॥
उनमें से वरुण केवल जल पीकर (तप करते हुये) पश्चिम सागर में अवस्थित थे तथा मित्र इस मित्रवन में वायुभक्षण करके तप कर रहे थे॥४॥
अथ मेरोगिरिशृङ्गात् प्रच्युतो गन्धमादनात्।
नारदः सुमहद्भूतः सर्वलोकानचीवरत् ॥५॥
आजगामाथ तत्रैव यत्र मित्रोऽचरत्तपः।
तद्दृष्ट्वा तु तपस्यन्तं तस्य कौतूहलं ह्यभूत् ॥६॥
तदनन्तर मेरुपर्वत के शृङ्ग गन्धमादन से सभी लोकों से होते हुये विचरण करते नारद (देवर्षि) वहाँ आये, जहाँ मित्र तपस्या कर रहे थे। उनको तप करते देखकर नारद को अत्यन्त कुतूहल हो गया॥५-६॥