साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःसप्ततितमोऽध्यायः
(बीजप्रसवः)
उत्तरा योनयस्तेषां मन्त्रास्ताभ्यो विनिःसृताः।
अष्टाक्षरा तु भूत्यन्ते व्योमादि प्रथमा हि सा॥१॥
शिवयोनिः।
उत्तर में योनि, उनका मन्त्र उससे ही विनिःसृत हुआ है। अष्टाक्षरयुक्त (मन्त्र) भूति के अन्त में है। व्योमादि तथा वह प्रथमा है। इसे शिवयोनि कहते हैं॥१॥
ॐकारादि हकारान्ता अक्षराः परमाः पराः।
मुक्तये विहिता पुण्या योनिः शब्दवतां मता॥२॥
परयोनिः।
जिसके आदि में ॐ है, अन्त में ‘ह’ है, वह श्रेष्ठ परयोनि है। मुक्ति के लिये यह पुण्य योनि विहित है। यह शब्दविद् गण को ईप्सित है। यह पर योनि है॥२॥
दिशि कारणयोनिः स्याद् द्वन्द्ववाहो ह्यनन्तरम्।
सबिंद्वाकारपूर्वा सा भूत्यन्ताश्चतुरक्षराः॥३॥
कारणयोनिः।
दिक् में कारण योनि होती है। तदनन्तर द्वन्द्व वहनकारी गण हैं। वह बिन्दु के साथ आकार के पूर्व हैं तथा भूत्यन्त चतुरक्षरात्मक है। यह कारणयोनि है॥३॥
क्रियाशक्तिस्तथान्यस्य पञ्चवर्णैयमात्मनः।
इकारादिस्तकारान्ता भूतये त्रिगुणस्य तु॥४॥
क्रियायोनिः।
क्रियाशक्ति आत्मा की पञ्चवर्णात्मिका है। इकारादि तकारान्त त्रिगुण के मंगलार्थ है। यह क्रिया योनि है॥४॥
वारुणाभ्यां भूतयोनिः स्यादुकारादिषडक्षरम्।
भकारान्ता च सा ज्ञेया भुवनस्य वनस्य तु॥५॥
भूतयोनिः।
वारुणद्वय से भूतयोनि होती है। वह उकारादि अक्षरद्वययुक्त है तथा मकारान्त है। इसे भुवनत्रय के पालनार्थ जानना चाहिये। यही है—भूतयोनि॥५॥