भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ३७३

सप्ताक्षरपरा चास्याः भूतयोनेरनन्तरम्।
व्योमादिवायुदेवान्ता वायव्या बीजयोनिका ॥६॥
बीजयोनिः।

इस भूतयोनि के पश्चात् सप्ताक्षर-विशिष्ट, जिसके आदि में व्योम है तथा अन्त में वायुदेव है, वह वायव्या बीजयोनि है। यही है—बीजयोनि॥६॥

वकारादिमकारान्ता मध्ये व्योमसमीरणात्।
सृष्टियोनिः परा द्वे च दश चैकाक्षराणि तु ॥७॥
सृष्टियोनिः।

वकार जिसके आदि में है, अन्त में मकार है, मध्य में व्योम तथा वायु है, जिससे सृष्टि योनि उत्पन्न होती है। यह १३ अक्षरों से युक्त है। यह है—सृष्टि योनि॥७॥

संहारो द्वादशास्यां ते प्रणवाद्यन्तदीपितः।
सर्वस्य वाङ्मयस्यैष संहर्त्ता केवलः प्रभुः ॥८॥
संहारयोनिः।

द्वादश से संहार होता है। उसका आदि एवं अन्त प्रणव से दीपित है। यही है—संहार योनि॥८॥

क्षणपूर्णाविथोङ्कारौ द्वारपालौ तु बाह्यतः।
कुम्भाकृतिरुदग्द्वारं धृतं भूतैश्च सर्वतः ॥९॥
योनयः पार्थिवान्यस्थास्तन्त्रस्य त्रयमादितः।
पृथ्वी यः पूरयेत् सप्त विभक्तेः प्रणवाष्टकः ॥१०॥
पार्थिवयोनिः।

क्षणपूर्ण दो ओंकार हैं। बाहर वे द्वारपाल हैं। कुम्भाकृति, जलपूर्ण द्वारयुक्त धृतरूप है। वह सभी ओर से प्राणीगण से वेष्टित है। उसकी सभी योनि है—पार्थिव योनि। यह तन्त्र के आदि से ही तीन है। जो पृथिवीरूपा है, जो सप्तविंशति पूर्ण करती है तथा आठ प्रणवयुक्ता है। यह है—पार्थिव योनि॥९-१०॥

अक्षराणां च योनिः स्यादादिवर्णा यथाक्रमात्।
सर्वत्र बीजनं कार्यं बीजिनां प्रणवेन हि ॥११॥
अपां योनिः।

जो अक्षरसमूह की योनि है, यथाक्रमेण आदिवर्ण बीजधारी गण का प्रणव द्वारा सर्वत्र बीजन ही इसका कार्य है। यह है—जलयोनि॥११॥