साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः ३३
पुरुषरूप से पालन करते हैं (स्थिति); यह है—स्वयम्भु की तीन अवस्था। वे स्वयं को तीन भाग करके भूत-भविष्य-वर्त्तमान अथवा सृष्टि-स्थिति-संहार का प्रवर्त्तन करते हैं।।१४।।
सृज्यते ग्रसते चैव वीक्ष्यते च त्रिभिः स्वयम्।
अग्रे हिरण्यगर्भस्तु प्रादुर्भूतः स्वयम्भुवः ॥१५॥
स्वयं ही तीन गुणों से सृष्टि, विनाश तथा दर्शन (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) करते हैं। स्वयम्भु ही हिरण्यगर्भ रूप से प्रादुर्भूत हैं।।१५।।
आदित्यस्त्वादिवेदत्वादाजातत्वादजः स्मृतः।
देवेषु च महादेवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥१६॥
सर्वेशत्वाच्च लोकस्य ह्यवश्यत्वात् स चेश्वरः।
बृंहित्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भव उच्यते ॥१७॥
वे आदिदेव आदित्य हैं (आदिदेव होने के कारण आदित्य हैं)। अजात होने के कारण अज हैं। देवों में वे महान् देव होने के कारण महादेव हैं। समस्त जगत् के सत्त्वरूप होने के कारण तथा उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता, इस कारण वे ईश्वर हैं। बृहत् होने से वे ब्रह्मा हैं तथा भूतरूप (उत्पन्नरूप) होने से वे भव हैं।।१६-१७।।
यान्ति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।
पुर्यां तु शेते यस्माच्च तस्मात् पुरुष उच्यते ॥१८॥
जिससे समग्र प्रजा की उत्पत्ति होती है, वे प्रजापति यही हैं। वे पुरी में (प्रत्येक देह में) शयन करने के कारण पुरुष कहलाते हैं।।१८।।
नोत्पादनत्वात् पूर्वत्वात्स स्वयम्भुरिति स्मृतः।
हिरण्येन तु गर्भस्थो यस्मादेव समावृतः ॥१९॥
तस्माद्धिरण्यगर्भेति सूर्यो देवो निगद्यते।
वे कभी भी उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनका उत्पादक, जनक कोई भी नहीं है तथा वे सबसे पूर्व के होने के कारण स्वयम्भु कहलाते हैं। हिरण्य द्वारा गर्भस्थ होकर समावृत होने के कारण वे हिरण्यगर्भ कहलाते हैं।।१९।।
आपो नारा इति प्रोक्ता ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२०॥
अयनं तस्य तत्पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।
तत्त्वदर्शी ऋषिगण 'नारा' जल को कहते हैं, उसके अयन होने के कारण इनको नारायण कहा जाता है।।२०।।