भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३४ श्रीसाम्बपुराणम्

अरमित्येष सिद्धार्थे निपातः करिभिः स्मृतः ॥२१॥ कविगण अर शब्द का अर्थ सिद्धार्थ निपात कहते हैं॥२१॥

एकार्णवे पुरा तस्मिन् नष्टे स्थावर-जङ्गमे । नारायणाख्यः पुरुषः सुष्वाप सलिले स्मृतः ॥२२॥ स्थावर एवं जंगम के नष्ट हो जाने पर अर्थात् प्रलय में सृष्टि का विनाश हो जाने पर इसी एकार्णव सलिल में नारायण नामक पुरुष शयन करते हैं॥२२॥

सहस्रशीर्षा सुमहान् सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रभुक् । सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिः सूर्याख्यतेजाः पुनरुच्यते रविः ॥२३॥ आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता ह्यपूर्व एकः पुरुषः पुराणः । हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा स ईष्यते वै तमसः परस्तात् ॥२४॥ वह महान् पुरुष सहस्र मस्तकों से युक्त है (सहस्र = असंख्य)। वह सहस्र पैरों से युक्त है। सहस्र चक्षु तथा मुखयुक्त है। वह हजारों बार (असंख्य बार) भोजन करने वाला है। उसके हजारों बाहु हैं। वह प्रथम प्रजापति सूर्य नामक तेजयुक्त है; अतः उसे रवि कहते हैं। वह आदित्यवर्ण (सूर्य के समान उज्ज्वल कान्ति वाला), भुवनों का पालक, अपूर्व, पुराणपुरुष, हिरण्यगर्भ है। तमोलोक के पश्चात् उसे प्राप्त किया जाता है॥२३-२४॥

तुल्यं युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः । संवर्त्तन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात् ॥२५॥ सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा कार्यं विचिन्त्य सः । भूत्वा वै स तु वाराहो ह्यपः संविशते प्रभुः ॥२६॥ वे हजारों युगों के तुल्य नैश (रात्रि) अन्धकार को दूर करके प्रलयान्त में सृष्टि के लिये ब्रह्मारूप से आविर्भूत हो जाते हैं। वह प्रभु भूमि को जल से आप्लुत देखकर सृष्टिकार्य की विवेचना करके वराह रूप से जल में प्रवेश करते हैं॥२५-२६॥

सञ्चिन्त्यैवं च देवोऽसौ भूमेरुद्धरणं क्षमः । महीं महार्णवे मग्नामुद्धर्तुमुपचक्रमे ॥२७॥ पृथ्वी के उत्तरण में सक्षम वह देव इस प्रकार की चिन्तना करके महार्णव में डूबी पृथ्वी का उद्धार करने का उपक्रम करने लगे॥२७॥

उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेर्महावराहस्य महीं निधाय । विधुन्वतो वेदमयं शरीरं लोमान्तरस्था मुनयो जयन्ति ॥२८॥ पृथ्वी को धारण करके जल से उत्थित जलसिक्त कुक्षियुक्त महावराह के विकम्पन से प्रकटित वेदमय शरीर की उनके लोमों में स्थित मुनिगण आराधना करने लगे॥२८॥

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