भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः ३९

नक्षत्र-ग्रह-सोमानां प्रतिष्ठा योनिरेव च।
चन्द्राद्याश्च ग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ॥६०॥

चार सौ रश्मियाँ तिर्यक् रूप से पितृलोक को तथा तीन सौ रश्मियाँ ऊर्ध्व रूप में स्वर्गलोक को प्रकाशित करती हैं। यह मण्डल शुक्ल है तथा भास्कर लोक कहा जाता है। सूर्य ही नक्षत्र, ग्रह तथा सोम की प्रतिष्ठा का कारण है। चन्द्रादि सभी ग्रह सूर्य से ही उत्पन्न हैं॥५९-६०॥

रवेः करसहस्रं यत् प्राङ्‌मया समुदाहृतम्।
तेषां श्रेष्ठाः शुभाः सप्तरश्मयो ग्रहयोनयः ॥६१॥
सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।
विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः सौम्यश्च सुरतः स्मृतः ॥६२॥
उदन्वसुः पुनश्चान्यः सुरादन्यः प्रकीर्त्तितः ॥६३॥

मैंने जो पूर्व में सूर्य के सहस्र किरणों की बात कही है, उनमें से श्रेष्ठ मंगलकारी सात रश्मियाँ ग्रहयोनि हैं अर्थात् ग्रहों की उत्पत्ति में अलग से सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सौम्य (बुध ग्रह), सुव्रत तथा उदन्वसु देवता कहे गये हैं॥६१-६३॥

सुषुम्नः सूर्यरश्मिर्यः क्षीणं शशिनमेधते।
अमृतं स्वर्धमानेन सम्भृत्यैकेन रश्मिना ॥६४॥

सुषुम्न नामक क्षीण सूर्यरश्मि क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करती है एवं एक रश्मि द्वारा मिलित होकर अमृत का वर्द्धन करती है॥६४॥

आप्यायनाच्च देवानामादित्यश्चन्द्रतिग्मतः।
शुक्लत्वामृतशीतत्वे दीप्तौ चाह्लादनेऽपि च ॥६५॥
धातुश्च दीप्तिबह्वर्थ्यस्तेनासौ चन्द्र उच्यते।
संयद्वसुस्तु यो रश्मिर्योनिः सोऽङ्गारकस्य तु ॥६६॥

आदित्य के चन्द्रकिरणों से देवगण आप्यायन करते हैं। शुक्लत्व, अमृतत्व, शीतत्व, दीप्ति तथा आह्लाददान (आनन्ददान), दीप्ति प्रभृति अनेक अर्थ के वाचक होने से इसे चन्द्र कहा जाता है। संयद्वसु नामक जो योनि है, वह अङ्गारक (मङ्गल) की योनि है॥६५-६६॥

दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्यायते बुधम्।
उदावसुस्तु यो रश्मिर्योनिः स तु बृहस्पतेः ॥६७॥

दक्षिण दिशा की विश्वकर्मा नामक रश्मि बुध को आप्यायित करती है। उदावसु नामक रश्मि बृहस्पति की योनि (कारण) है॥६७॥