साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० | श्रीसाम्बपुराणम्
विश्वव्यचास्तु यः पश्चाच्छुक्रयोनिः स वै स्मृतः।
शनैश्चैवं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते स्वराट्॥६८॥
हरिकेशस्तु यो रश्मिस्तेजो नक्षत्रयोगिनः।
न क्षीयन्ते यतस्तानि तेषां नक्षत्रता ततः॥६९॥
क्षत्रं वीर्यं बलं तेज इति चैकार्थवाचकम्।
सूर्यः क्षत्रं तथादत्ते तेषां नक्षत्रता स्मृता॥७०॥
विश्वव्यचा नामक जो रश्मि पीछे रहती है, वह शुक्र की उत्पत्ति का कारण है। सूर्य स्वयं शनैश्चर को आप्यायित करते हैं। हरिकेश नामक जो रश्मि है, वह नक्षत्रयोगियों का तेज है; क्योंकि वे क्षय-प्राप्त नहीं होते, अतः नक्षत्र कहे गये हैं। क्षत्र, वीर्य, बल, तेज—ये सभी एकार्थ-वाचक शब्द हैं। सूर्य का तेज ग्रहण करने के कारण ही इनको नक्षत्र कहा गया है॥६८-७०॥
अस्माद् लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतैर्गृहात्।
तारणात्तारका ह्येषा शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥७१॥
सूर्यस्यैवापरो रश्मिर्नाम्ना वृष्टिपतिः स्मृतः।
समत्वं प्रतिबद्धस्तु स जीवयति वै जगत्॥७२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सर्वव्यापित्वनिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः
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इस पृथ्वीलोक से लेकर उस लोक में (स्वर्गादि में) सुकृति के फल से जो उत्तीर्ण हैं, उन्हें तारण कराने के लिये तारका नाम से अभिहित हैं। शुक्लत्व के कारण भी इन्हें तारका कहते हैं। सूर्यदेव की ही अन्य रश्मि वृष्टिपति नाम से स्मृत है। सूर्य के साथ युक्त होने से समान रूप से रक्षा करके ये जगत् को जीवित करते हैं॥७१-७२॥
श्रीसाम्बपुराण का सर्वव्यापित्व-निरूपण नामक सप्तम अध्याय समाप्त
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