साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[मुद्रा/सील: ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान, सम्पादकीय विभाग, शान्ति कुञ्ज, हरिद्वार]
निवेदन
अखिल ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्ण की अहैतुक लीला का एक विचित्र आयाम साम्बपुराण में अंकित है। साम्ब श्रीकृष्ण के पुत्र थे। उनकी पट्टमहिषियों में से अन्यतम जाम्बवती के पुत्र अनुपम रूपराशि के स्वामी होकर भी वे अदृष्टवशात् कुष्ठरोग से आक्रान्त हो गये। वे श्रीकृष्ण द्वारा ही शापित होकर इस दुर्गति को प्राप्त हुये थे। यह भगवान् के कठोर शासन का ही एक रूप है, जहाँ अपने प्रिय पुत्र को भी उन्होंने इतना कठोर दण्ड प्रदान किया।
इस शाप से मुक्ति-हेतु देवर्षि नारद की शरण में जाने पर उन्हें सूर्य की उपासना का उपदेश मिला। तन्त्र के ग्रन्थ साम्बपञ्चाशिका में भी यह वृत्तान्त वर्णित है; लेकिन उसमें साम्बपुराण की तरह बाह्य प्रक्रियात्मक उपासना न होकर स्वात्मदेवतारूप सूर्य की अभेद-रूप अद्वय भक्ति का, अहंविमर्शात्मक पराभक्ति का स्वरूप प्रत्यक्षीभूत होता है, जो शाक्तोपाय की चरम स्थिति है। लेकिन वह सर्वजनग्राह्य अथवा सबके मलिन चित्तमुकुर पर प्रतिच्छवित हो सकने वाली स्थिति नहीं है। पराहंतारूप विमर्श के लाखों करोड़ों में एकाध ही अधिकारी हो सकते हैं। जनसामान्य के लिये वह मार्ग सर्वदा अगोचर ही है। अतः साम्बपुराण के रूप में उसी उपासना का सार्वजनीन रूप प्रस्तुत किया गया है, जो सर्वजन-सुलभ है तथा अज्ञानी जीव भी उस मार्ग का अनुसरण करके क्रमशः अग्रसर हो सकते हैं।
आजकल बिहार में जिस ‘छठ पूजा’ का विशेष महत्त्व माना जाता है, उसका उत्स इसी साम्बपुराण में ही है। षष्ठी-पूजन तथा व्रत के अपूर्व माहात्म्य का इस पुराण में विशेष वर्णन प्राप्त होता है—
एकहारपरो भूत्वा षष्ठ्यां योऽर्चयते रविम्।
नियमव्रतधारी च रवेर्भक्तिसमन्वितः।
सप्तम्यां च महाप्राज्ञः सोश्वमेधफलं भवेत्।
अहोरात्रोपवासेन पूजयेद्यस्तु भास्करम्।
सप्तम्यामथ षष्ठ्यां च सूर्यलोकं स गच्छति।। (अध्याय-३८)
जो षष्ठी के दिन एक बार ही आहार करके सूर्यार्चन करते हैं और सप्तमी को भक्तिभाव से व्रतपालन करते हैं, वे अश्वमेध का फल प्राप्त करते हैं। जो सप्तमी अथवा षष्ठी को अहोरात्र उपवासोपरान्त सूर्योपासना करते हैं, उन्हें सूर्यलोक में स्थान मिलता है।