साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ श्रीसाम्बपुराणम्
भवन्त्यतीव यस्माद्वा स्वर्गेऽपि क्षुद्विवर्जिता ।
छायाति विशते दिव्या स्मृता सा तेन निक्षुभा ॥५७॥
जो अत्यन्त रूप से विद्यमान है अथवा स्वर्ग में जो क्षुधा-विवर्जित है, दिव्य छाया में जो प्रवेश करती है, इसी कारण उन्हें निक्षुभा कहा गया है॥५७॥
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः ।
धर्मेण रक्षयामास धर्मराजस्ततोऽभवत् ॥५८॥
यम उस अभिशाप से अत्यन्त पीड़ित होकर धर्म द्वारा (पिता द्वारा) रक्षित हुये थे; इसीलिये उनको धर्मराज कहा गया॥५८॥
शुभेन कर्मणा चैव संप्राप्तः परमां द्युतिम् ।
पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च ॥५९॥
शुभ कर्म द्वारा (यम ने) परम द्युति प्राप्त किया तथा पितृगण का आधिपत्य एवं लोकपालत्व पाया॥५९॥
यस्तु ज्येष्ठो मनुस्तेषां सर्गस्तस्य तु साम्प्रतम् ।
तस्याप्यैक्ष्वाकवो वंशो यस्मिन् जातो बृहद्बलः ॥६०॥
इनमें से जो ज्येष्ठ मनु थे, उनसे ही सृष्टि हुई है। उनसे इक्ष्वाकु वंश प्रादुर्भूत हुआ। उसी वंश में महाराज बृहद्बल ने जन्म लिया था॥६०॥
कनीयसी तयोर्यातु यमी कन्या यशस्विनी ।
अभवत्सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकपावनी ॥६१॥
उनमें जो कनिष्ठा, यशस्विनी कन्या यमी थी, वे लोकपावनी श्रेष्ठ नदी यमुना हुईं॥६१॥
मनुः प्रजापतिश्चैव सावर्णिः सुमहातपाः ।
भाव्यः सोऽनागते तस्मिन् मनुः सावर्णिकोऽन्तरे ॥६२॥
मनु प्रजापति एवं महातपा सावर्णि भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥६२॥
मेरुपृष्ठे तपो दिव्यमथापि चरति प्रभुः ।
भ्राता शनैश्चरस्तस्य ग्रहत्वं स तु लब्धवान् ॥६३॥
उनके भ्राता शनिश्चर ने मेरुपृष्ठ पर तपस्या करके ग्रहत्व प्राप्त किया था॥६३॥
तपती नाम या भानोस्तयोः कन्या कनीयसी ।
सा बभूव शुभा पत्नी राज्ञः संवरणस्य तु ॥६४॥