साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः
(सूर्यस्य शरीरलिखनम्)
साम्ब उवाच
शरीरलिखनं भानोरुक्तं संक्षेपतस्त्वया ।
विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥१॥
साम्ब कहते हैं—सूर्य के शरीर के मसृणता-सम्पादन के विषय में आपने संक्षेप में कहा है। मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ। हे सुव्रत! मुझसे कहिये॥१॥
नारद उवाच
पितृगृहे गतायां तु संज्ञायां यदुनन्दन ।
भास्करश्चिन्तयामास संज्ञां मद्रूपकाङ्क्षिणीम् ॥२॥
याता पितृगृहं यच्च तपस्तेपे यशस्विनी ।
तस्मान्मनीषितं तस्याः पूरयामि मनोरथम् ॥३॥
नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन साम्ब! संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर भास्कर चिन्ता करने लगे ‘संज्ञा मुझे रूपवान् देखना चाहती है। पिता के घर पर वह यशस्विनी तप कर रही है। अतएव मैं उसका मनोरथ पूर्ण करूँगा’॥२-३॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा तत्रागत्य दिवाकरम् ।
ऊचे मधुरया वाचा रवेः प्रीतिकरं वचः ॥४॥
इस अवसर पर ब्रह्मा वहाँ आकर मधुर भाषा में प्रीतिकर वाक्यों द्वारा सूर्य से इस प्रकार कहने लगे॥४॥
आदिदेवोऽसि देवानां ज्ञातमेतत् स्वयं मया ।
श्वशुरो विश्वकर्मा ते रूपं निर्वर्त्तयिष्यति ॥५॥
तुम देवगण के आदिदेव हो, यह मैं स्वयं जानता हूँ। तुम्हारे श्वसुर विश्वकर्मा तुम्हारे रूप का परिवर्त्तन कर देंगे अर्थात् काट-छाँटकर मसृण तथा सुश्रीक कर देंगे॥५॥
एवमुक्त्वा रविं ब्रह्मा विश्वकर्माणमब्रवीत् ।
निवर्त्तयस्व रूपं तं मार्त्तण्डस्य तु शोभनम् ॥६॥
तदनन्तर ब्रह्मा ने रवि से ऐसा कहने के उपरान्त विश्वकर्मा से कहा—तुम मार्त्तण्ड को शोभन रूप से युक्त कर दो॥६॥