सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ नवम अध्याय ॥ मुक्तिमिच्छसि चेत्तात! विषयान् विषवत् त्यज। क्षमाऽऽर्गवं दय शौचं सत्यं पीयूषवत् पिब ॥ यदि मुक्ति चाहते हो तो समस्त विषय-वासनाओं को विष के समान छोड़ दो और क्षमाशीलता, नम्रता, दया, पवित्रता और सत्यता को अमृत की भांति पियो अर्थात अपनाओ।।1।। भाव यह है कि मनुष्य मोह-माया तथा इच्छाओं का परित्याग करके क्षमा, सहनशीलता, दया, पवित्रता और सत्य का आचरण करे तो उसे मोक्ष प्राप्त हो सकता है। जन्म-मरण के बंधनों से छूटना ही मोक्ष है। परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः। त एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ जो नीच व्यक्ति परस्पर की गई गुप्त बातों को दूसरों से कह देते हैं, वे ही दीमक के घर में रहने वाले सांप की भांति नष्ट हो जाते हैं॥2॥ CCO. Vasishtha Tripathi 105 Collection. Digitized by eGangotri