सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभयभीत उसी से हुआ जा सकता है, जिसमें कुछ दंड देने की सामर्थ्य हो। जिसमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उससे डर कैसा ? अपना हानि-लाभ देखकर ही कोई किसी से प्रभावित होता है। निर्विषेणाऽपि सर्पेण कर्तव्या महती फणा। विषमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो भयंकरः ॥ विषहीन सर्प को भी अपना फन फैलाकर फुफकार करनी चाहिए। विष के न होने पर फुफकार से उसे डराना अवश्य चाहिए।।10।। यदि विषहीन सांप ऐसा नहीं करेगा तो वह अपना बचाव नहीं कर पाएगा। लोग उसे पत्थर मारेंगे। तात्पर्य यह है कि राजा के पास शक्ति चाहे थोड़ी हो, पर उसे अपनी शक्ति का दिखावा करके शत्रु को भयभीत अवश्य करते रहना चाहिए। प्रातर्धूतप्रसंगेन मध्यान्हे स्त्रीप्रसंगतः। रात्रौ चौर्यप्रसंगेन कालो गच्छत्ये धीमताम्॥ प्रातःकाल जुआरियों की कथा से (महाभारत की कथा से), मध्याह्न (दोपहर) का समय स्त्री प्रसंग से (रामायण की कथा से) और रात्रि में चोर की कथा से (श्रीमद्भागवत की कथा से) बुद्धिमान लोग अपना समय काटते हैं।।11।। जुआरियों की कथा को महाभारत की कथा से जोड़कर दिखाया है कि राजनीतिकारों को जुए की लत से कितना भारी नुकसान उठाना पड़ता है। स्त्री-प्रसंग की कथा को रामायण से जोड़कर बताया गया है कि पर स्त्री हरण से कितना बड़ा विनाश होने की संभावना रहती है और चोर की कथा को श्रीमद्भागवत से जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियों के रहते हुए भी इन्द्रिय-निग्रह की भावना का प्रतिपादन किया गया है। 107 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri