भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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भाव यह है कि बुद्धिमान वही है जो परस्त्री-गमन से दूर रहता है और सदैव अपनी इन्द्रियों को संयम में रखने का प्रयत्न करता है। स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्तघृष्टचन्दनम्। स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक्रस्यापि श्रियं हरेत्॥ अपने हाथों से गुंथी माला, अपने हाथों से घिसा चंदन और अपने हाथ से लिखा स्तोत्र, इन सबको अपने ही कार्य में लगाने से, देवताओं के राजा इंद्र की श्रीलक्ष्मी भी नष्ट हो जाती है॥12॥ भाव यह है कि प्रभु-मूर्ति को अपने हाथों से गुंथी माला पहनाने से, अपने हाथों से घिसा चंदन लगाने से और अपने द्वारा रचित स्तुति को गाने से संसार के किसी ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं रहती। इक्षुदंडास्तिलाः क्षुद्राः कान्ता हेम च मेदिनी। चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥ ईख, तिल, क्षुद्र, स्त्री, स्वर्ण, धरती, चंदन, दही और पान, इनको जितना मसला जाता है, उतनी गुण-वृद्धि होती है॥13॥ ईख पेरने से रस, तिल मथने से तेल, नीच और स्त्री को ताड़ने से अनुकूलता, स्वर्ण को तपाने से अधिक चमक, धरती में हल चलाने से उपजाऊ शक्ति की वृद्धि, दही मथने से मक्खन निकलता है और चंदन तथा पान को रगड़ने से सुगंध पैदा होती है। भाव यह है कि जीवन में जितनी अधिक साधना की जाती है, उसका उतना ही अधिक फल प्राप्त होता है। दरिद्रता धीरतया विराजते, कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते। कदन्नता चोष्णतया विराजते, कुरूपता शीलतया विराजते॥ दरिद्रता के समय धैर्य रखना उत्तम है, मैले कपड़ों को 108 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri