भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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आचार्य चाणक्य के प्रस्तुत श्लोक से यह संदेश मिलता है कि मनुष्य योनि में जन्म लेकर मनुष्य को विद्या ग्रहण करनी चाहिए, साधना और दान की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए, सदाचार की भावना का पालन करना चाहिए अन्यथा उनमें और पशु में अंतर ही क्या है। अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते। मलयाचलसंसर्गात् न वेणुश्चन्दनायते॥ शून्य हृदय पर कोई उपदेश लागू नहीं होता। जैसे मलयाचल के संबंध से बांस चंदन का वृक्ष नहीं बनता॥8॥ आचार्य चाणक्य के अनुसार जिस मनुष्य में भावना नहीं, योग्यता नहीं वह किसी भी प्रकार के उपदेश से लाभ नहीं उठा सकता। जिस प्रकार मलयगिरि पर उगने से ही बांस चंदन के वृक्ष की भांति सुगंध से परिपूर्ण नहीं हो जाता। यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्। लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥ जिनको स्वयं बुद्धि नहीं है, शास्त्र उनके लिए क्या कर सकता है? जैसे अंधे के लिए दर्पण का क्या महत्त्व है?॥9॥ भाव यह है कि जो पूरी तरह मूर्ख है, उनके लिए शास्त्र भी कुछ नहीं कर सकते। दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले। अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्॥ इस पृथ्वी पर दुर्जन व्यक्ति को सज्जन बनाने का कोई उपाय नहीं है, जैसे सैकड़ों बार धोने के उपरान्त भी गुदा-स्थान शुद्ध इन्द्री नहीं बन सकता॥ 10॥ 113