सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमल त्यागने का स्थान सैकड़ों बार धोने के उपरान्त भी अशुद्ध स्थान ही माना जाता है। इस प्रकार दुर्जन व्यक्ति को कितना भी अच्छा बनाने का प्रयास किया जाए, वह सज्जन नहीं बन पाता। आत्मद्वेषाद् भवेन्मृत्युः परद्वेषाद् धनक्षयः। राजद्वेषाद् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥ अपनी आत्मा से द्वेष करने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है-दूसरों से अर्थात शत्रु से द्वेष के कारण धन का नाश और राजा से द्वेष करने से अपना सर्वनाश हो जाता है, किंतु ब्राह्मण से द्वेष करने से सम्पूर्ण कुल का ही नाश हो जाता है।। 11।। भाव यह है कि विद्वानों, राजा, ब्राह्मण और जीवन में साथ-साथ चलने वाले परिजनों का विरोध न करके उनका स्नेह और सौहार्द्र ही प्राप्त करना चाहिए। वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं, द्रुमालयः पत्रफलाम्बु सेवनम्। तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं, न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम्॥ बड़े-बड़े हाथियों और बाघों वाले वन में वृक्ष का कोट रूपी घर अच्छा है, पके फलों को खाना, जल का पीना, तिनकों पर सोना, पेड़ों की छाल पहनना उत्तम है, परंतु अपने भाई-बंधुओं के मध्य निर्धन होकर जीना अच्छा नहीं।। 12 ।। यहां निर्धनता के अभिशाप और धन के महत्त्व को प्रकट करते हुए चाणक्य कहते हैं कि निर्धनता हर तरह से खराब है। विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च संध्या, वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं, छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥ ब्राह्मण वृक्ष है, संध्या उसकी जड़ है, वेद शाखाएं हैं, धर्म तथा कर्म पत्ते हैं इसलिए ब्राह्मण का कर्तव्य है कि संध्या की रक्षा करें क्योंकि जड़ के कट जाने से पेड़ के पत्ते व शाखाएं नहीं रहतीं।। 13 ।। 114