सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
मल त्यागने का स्थान सैकड़ों बार धोने के उपरान्त भी अशुद्ध स्थान ही माना जाता है। इस प्रकार दुर्जन व्यक्ति को कितना भी अच्छा बनाने का प्रयास किया जाए, वह सज्जन नहीं बन पाता। आत्मद्वेषाद् भवेन्मृत्युः परद्वेषाद् धनक्षयः। राजद्वेषाद् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥ अपनी आत्मा से द्वेष करने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है-दूसरों से अर्थात शत्रु से द्वेष के कारण धन का नाश और राजा से द्वेष करने से अपना सर्वनाश हो जाता है, किंतु ब्राह्मण से द्वेष करने से सम्पूर्ण कुल का ही नाश हो जाता है।। 11।। भाव यह है कि विद्वानों, राजा, ब्राह्मण और जीवन में साथ-साथ चलने वाले परिजनों का विरोध न करके उनका स्नेह और सौहार्द्र ही प्राप्त करना चाहिए। वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं, द्रुमालयः पत्रफलाम्बु सेवनम्। तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं, न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम्॥ बड़े-बड़े हाथियों और बाघों वाले वन में वृक्ष का कोट रूपी घर अच्छा है, पके फलों को खाना, जल का पीना, तिनकों पर सोना, पेड़ों की छाल पहनना उत्तम है, परंतु अपने भाई-बंधुओं के मध्य निर्धन होकर जीना अच्छा नहीं।। 12 ।। यहां निर्धनता के अभिशाप और धन के महत्त्व को प्रकट करते हुए चाणक्य कहते हैं कि निर्धनता हर तरह से खराब है। विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च संध्या, वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं, छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥ ब्राह्मण वृक्ष है, संध्या उसकी जड़ है, वेद शाखाएं हैं, धर्म तथा कर्म पत्ते हैं इसलिए ब्राह्मण का कर्तव्य है कि संध्या की रक्षा करें क्योंकि जड़ के कट जाने से पेड़ के पत्ते व शाखाएं नहीं रहतीं।। 13 ।। 114
भाव यह है कि ब्राह्मण को अपनी साधना तथा अध्यवसाय नहीं त्यागना चाहिए। जो तपस्वी और विद्वान है, वही ब्राह्मण है। माता च कमलादेवी पिता देवो जनार्दनः। बांधवाः विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्॥ जिसकी माता लक्ष्मी है, पिता विष्णु देव हैं, भाई-बंधु विष्णु के भक्त हैं, उनके लिए तीनों लोक ही अपने देश हैं।।14।। भक्त-जनों के लिए तीनों लोक उनके अपने घर के समान ही हैं। विष्णु तथा लक्ष्मी उनके माता-पिता हैं। जिस पर विष्णु-लक्ष्मी की कृपा है और जो उनके भक्तों के मध्य निवास करता है, उसके लिए तीनों लोक उसके पास हैं। एकवृक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमाः। प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना॥ अनेक रंग और रूपों वाले पक्षी सायं काल एक वृक्ष पर आकर बैठते हैं और प्रातः काल दसों दिशाओं में उड़ जाते हैं। ऐसे ही बंधु-बांधव एक परिवार में मिलते हैं और बिछुड़ जाते हैं। इस विषय में शोक कैसा ?।।15।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक के द्वारा कहा है कि जो भी जड़-चेतन इस संसार में जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, जब मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, फिर इसके लिए शोक-संताप कैसा ? प्रलाप कैसा ? प्रकृति के जन्म-मृत्यु से चिंतित होने से कोई लाभ नहीं। बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेश्च कुतो बलम्। वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥ जो बुद्धिमान है, वही बलवान है, बुद्धिहीन के पास शक्ति 115
नहीं होती। जैसे जंगल में सबसे अधिक बलवान होने पर भी सिंह मतवाला होकर खरगोश के द्वारा मारा जाता है॥16॥ 'पंचतंत्र' में यह कथा आई है, जिसमें एक खरगोश अपनी चतुराई से सिंह की परछाई कुएं में दिखाकर, परछाई को उसका प्रतिद्वन्द्वी बता देता है। सिंह कुएं में उस पर छलांग लगा देता है और कुएं में डूबकर मर जाता है, अर्थात बुद्धि बल से बड़ी है। बुद्धि के द्वारा ताकतवर मनुष्य को भी पराजित किया जा सकता है। का चिंता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते, नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निर्मयेत्। इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलं, त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते॥ यदि भगवान जगत के पालनकर्ता हैं तो हमें जीने की क्या चिन्ता है? यदि वे रक्षक न होते तो माता के स्तनों से दूध क्यों निकलता? यही बार-बार सोचकर हे लक्ष्मीपति! अर्थात विष्णु! मैं आपके चरण-कमल में सेवा हेतु समय व्यतीत करना चाहता हूं॥17॥ विष्णु की उपासना के साथ-साथ कर्महीन होकर बैठ जाने की मंशा यहां नहीं है। भगवान उसी के सहायक होते हैं जो कर्म करता है। गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धिस्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम्। यथा सुराणाममृते स्थितेऽपि स्वर्गांगनानामधरासवे रुचिः॥ यद्यपि मेरी बुद्धि देववाणी (संस्कृत) में श्रेष्ठ है, तब भी मैं दूसरी भाषा का लालची हूं। जैसे अमृत पीने पर भी देवताओं की इच्छा स्वर्ग की अप्सराओं के ओष्ट रूपी मद्य को पीने की बनी रहती है॥18॥ 116 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
भाव यह है कि भले ही हम किसी श्रेष्ठ भाषा में पारंगत हों, पर दूसरी अन्य भाषाओं को जानने और समझने के लिए हमें सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। इससे ज्ञान बढ़ता है। अन्नाद् दशगुणं पिष्टं पिष्टाद् दशगुणं पयः। पयसोऽष्टगुणं मांसं मांसाद् दशगुणं घृतम्॥ अन्न की अपेक्षा उसके चूर्ण अर्थात पिसे हुए आटे में दस गुना अधिक शक्ति होती है। दूध में आटे से भी दस गुना अधिक शक्ति होती है। मांस में दूध से भी आठ गुना अधिक शक्ति होती है और घी में मांस से भी दस गुना अधिक बल है॥19॥ अतः मांस खाने वालों को घृत के सेवन का अभ्यास डालना चाहिए। आज दालें तथा सूखे मेवे भी मांस की पूर्ति कर सकने में समर्थ हैं। उनमें भी प्रोटीन काफी मात्रा में मिलता है। शाकेन रोगा वर्द्धन्ते पयसा वर्द्धते तनुः। घृतेन वर्धते वीर्यं मांसान्मांसं प्रवर्धते॥ • साग खाने से रोग बढ़ते हैं, दूध से शरीर बलवान होता है, घी से वीर्य (शक्ति) बढ़ता है और मांस खाने से मांस ही बढ़ता है॥20॥ अतः बल-बुद्धि और शक्ति के लिए घी-दूध का सेवन ही उत्तम है, मांस नहीं। साग-सब्जी से रोग तभी बढ़ते हैं, जब उन्हें अच्छी प्रकार से धोकर शुद्ध नहीं कर लिया जाता। शुद्ध न करने पर उसमें बाह्य कीटाणु रह जाते हैं, जो रोग बढ़ाते हैं। 117
॥ अथ एकादश अध्याय ॥ दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता। अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः॥ दान देने का स्वभाव, मधुर वाणी, धैर्य और उचित की पहचान, ये चार बातें अभ्यास से नहीं आतीं, ये मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं। ईश्वर के द्वारा ही ये गुण प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति इन गुणों का उपयोग नहीं करता, वह ईश्वर के द्वारा दिए गए वरदान की उपेक्षा ही करता है और दुर्गुणों को अपनाकर घोर कष्ट भोगता है॥1॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुणों को प्राप्त कर सकता है, परंतु अभ्यास से सबकुछ प्राप्त नहीं हो सकता। कुछ गुण ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक होते हैं। उनका वर्णन श्लोक में किया गया है। आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत्। स्वयमेव लयं याति यथा राजाऽन्यधर्मतः॥ जो अपने वर्ग को छोड़कर दूसरे के वर्ग का आश्रय ग्रहण करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है, जैसे राजा अधर्म के द्वारा नष्ट 118 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
हो जाता है। उसके पाप कर्म उसे नष्ट कर डालते हैं॥2॥ वस्तुतः जो व्यक्ति अपनों का न हुआ, वह दूसरों का कैसे हो सकता है ? अपनों को त्यागना ही अधर्म के मार्ग पर चलना है, जिससे अन्ततः हानि ही होती है। हस्ती स्थूलतनुः स चांकुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः। वज्रेणापि हताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रं गिरिस् तेजो यस्य विराजते सः बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः॥ हाथी मोटे शरीर वाला है, परंतु अंकुश से वश में रहता है। क्या अंकुश हाथी के बराबर है? दीपक के जलने पर अंधकार नष्ट हो जाता है। क्या दीपक अंधकार के बराबर है? वज्र से बड़े-बड़े पर्वत शिखर टूटकर गिर जाते हैं। क्या वज्र पर्वतों के समान है? सत्यता यह है कि जिसका तेज चमकता रहता है, वही बलवान है। मोटेपन से बल का अहसास नहीं होता॥3॥ भाव यह है कि किसी के आकार को देखकर उसकी शक्ति का अनुमान नहीं लगा लेना चाहिए। शक्ति साहस में होती है। कलौ दशसहस्रेषु हरिस्त्यजति मेदिनीम्। तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्द्धं ग्रामदेवता॥ कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने पर श्रीविष्णु (पालनकर्ता) इस पृथ्वी को छोड़ देते हैं, उसके आधा बीतने पर गंगा का जल समाप्त हो जाता है और उसके आधा बीतने पर ग्राम के देवता भी पृथ्वी को छोड़ देते हैं॥4॥ भाव यह है कि कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने के बाद इस धरती से जीवन-यापन के सभी समुचित साधन नष्ट हो 119 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
जाएंगे और दस हजार के आधे अर्थात् अगले पांच हजार वर्ष बीतने पर पापों का नाश करके मन को पवित्र करने वाली गंगा का जल भी समाप्त हो जाएगा और फिर उसके आधे अर्थात् अगले ढाई हजार साल बीतने पर धरती की कृषि-भूमि भी नष्ट हो जाएगी। इसका अर्थ यह है कि कलियुग के साढ़े सत्रह हजार वर्ष बीत जाने पर पुनः प्रलय होगी और यह धरती जल में डूब जाएगी। गृहाऽऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥ घर-गृहस्थी में आसक्त व्यक्ति को विद्या नहीं आती। मांस खाने वाले को दया नहीं आती। धन के लालची को सच बोलना नहीं आता और स्त्री में आसक्त कामुक व्यक्ति में पवित्रता नहीं होती॥5॥ विद्या प्राप्ति के लिए गृह-त्याग करके गुरु के पास जाना जरूरी है। मांसाहारी व्यक्ति दया भूल जाता है। लालची व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए बार-बार झूठ का सहारा लेता है और कामुक व्यक्ति सदा स्त्री-सम्भोग में लिप्त रहता है, तब वह पवित्र कैसे हो सकता है। न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः। आमूलसिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति॥ जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड़ को दूध और घी से सींचने के उपरांत भी वह अपनी कड़वाहट छोड़कर मृदुल नहीं हो जाता, ठीक इसी के अनुरूप दुष्ट प्रवृत्तियों वाले मनुष्यों पर सदुपदेशों का कोई भी असर नहीं होता॥6॥ कहने का आशय यह है कि दुष्ट मनुष्य की आदत बन चुके अवगुणों को बदला नहीं जा सकता। 120 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अंतर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि। न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च सत्॥ जिस प्रकार शराब वाला पात्र अग्नि में तपाए जाने पर भी शुद्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार जिस मनुष्य के हृदय में पाप और कुटिलता भरी होती है, सैकड़ों तीर्थ स्थानों पर स्नान करने से भी ऐसे मनुष्य पवित्र नहीं हो सकते॥7॥ भाव यही है कि जब तक मनुष्य अपने मन की मलिनता अर्थात् पाप में प्रवृत्त होने की भावना का त्याग नहीं करता, तब तक उसके तीर्थ-स्नान करने से भी कोई लाभ नहीं है। वह पापी ही बना रहता है। वह सैकड़ों तीर्थ-स्नानों पर स्नान करने से भी पवित्र नहीं हो पाता। न वेत्ति यो यस्यगुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्। यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुंजाः॥ इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि जो जिसके गुणों के महत्त्व को नहीं जानता, वह उसकी सदैव निन्दा करता है। जैसे जंगली भीलनी हाथी के गंडस्थल से प्राप्त मोती को छोड़कर गुंजाफल की माला को पहनती है॥8॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि पारखी ही किसी वस्तु के महत्त्व को समझ सकता है। जैसे जंगल में रहने वाली भीलनी हाथी के मस्तक से प्राप्त होने वाले बहुमूल्य काले मोती को छोड़कर लाल रत्तियों की माला पहनती है क्योंकि वह उस मोती के महत्त्व को नहीं जानती। इसी प्रकार हर कोई गुणों को नहीं जान पाता। जौहरी ही रत्नों की पहचान करता है। 121
यस्तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुंजति। युगकोटिसहस्रं तुः स्वर्गलोके महीयते॥ जो कोई प्रतिदिन पूरे संवत्-भर मौन रहकर भोजन करते हैं, वे हजारों-करोड़ों युगों तक स्वर्ग में पूजे जाते हैं।।9।। भाव यह है कि जो व्यक्ति संतोष के साथ जो मिले उसी पर संतुष्ट रहता है, उसे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। उसे न तो कोई दुख होता है और न ही कोई कष्ट। आचार्य चाणक्य का कहने का तात्पर्य यह है कि भोजन प्रसन्नमुख तथा शांतभाव से करना चाहिए। कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं श्रृंगारकौतुके। अतिनिद्राऽतिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्॥ काम (व्यभिचार), क्रोध (अभीष्ट की प्राप्ति न होने पर आपे से बाहर होना), लालच (धन-प्राप्ति की लालसा), स्वाद (जिह्वा को प्रिय लगने वाले पदार्थों का सेवन) श्रृंगार (सजना-धजना), खेल और अत्यधिक सेवा (दूसरों की चाकरी) आदि दुर्गुण विद्यार्थी के लिए वर्जित हैं। विद्यार्थी को इन आठों दुर्गुणों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।। 10।। कहने का आशय यह है कि ये अवगुण विद्यार्थी को कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचने देते, अर्थात विद्यार्थी को चाहिए किं वे इन आठों प्रकार के अवगुणों का पूरी तरह त्याग करें। अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा। कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते॥ बिना जोते हुए स्थान के फल, मूल खाने वाला, अर्थात ईश्वर की कृपा से प्राप्त हर प्रकार के भोजन से संतुष्ट होने वाला, 122 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
निरंतर वन से प्रेम रखने वाला और प्रतिदिन श्राद्ध करने वाला ब्राह्मण ऋषि कहलाता है॥11॥ भाव यह है कि जो संतुष्ट होकर भोजन करता है, गृहस्थी के मोह-बंधन में जो नहीं बंधा हुआ है और जो प्रतिदिन अपने पूर्वजों को याद करता है, वह ऋषि-मुनियों के ही समान तपस्वी है। एकाहारेण संतुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा। ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते॥ जो व्यक्ति एक बार के भोजन से संतुष्ट हो जाता है, छः कर्मों (यज्ञ करना, यज्ञ कराना, पढ़ना, पढ़ाना, दान देना, दान लेना) में लगा रहता है और अपनी स्त्री से ऋतुकाल (मासिक धर्म) के बाद ही प्रसंग करता है, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधि कारी है॥12॥ आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में ऋतु कालगामी होने की व्याख्या इस प्रकार है—स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल सोलह रात्रि का है। उसमें से चार रात्रि अर्थात रजोदर्शन से लेकर चार दिन निंदित हैं। ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निंदित हैं। शेष दस रात्रियां ऋतु दान में श्रेष्ठ हैं। जो संतान प्राप्ति के लिए ऐसी दस रात्रियों में समागम करता है वह ऋतुकालगामी कहलाता है। लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः। वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते॥ जो ब्राह्मण दुनियादारी के कामों में लगा रहता है, पशुओं का पालन करने वाला और व्यापार तथा खेती करता है, वह वैश्य (वणिक) कहलाता है॥13॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं होता। 123
लाक्षादि-तैल-नीलानां कुसुम्भ-मधु-सर्पिषाम्। विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते॥ लाख आदि, तेल, नील, फूल, शहद, घी, मदिरा (शराब) और मांस आदि का व्यापार करने वाला ब्राह्मण शूद्र कहलाता है।।14।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से पूर्व के श्लोक समान ही ब्राह्मण के कर्म से हटकर अन्य कार्य करने का निषेध किया है। तेल, नील, कुमकुम, मधु, घी, मद्य, मांस बेचने का यदि वह कार्य करता है तो वह शूद्र कहलाता है। वैश्य वर्ण में जन्म लेकर यदि कोई उक्त पदार्थों में से कुछ का व्यापार करता हो तो भले ही वैश्य कहलाए, पर ब्राह्मण यदि इनका व्यापार करे तो शूद्र कहलाता है। परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदुः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते॥ दूसरे के कार्य में विघ्न डालकर नष्ट करने वाला, घमण्डी, स्वार्थी, कपटी, झगड़ालू, ऊपर से कोमल और भीतर से निष्ठुर ब्राह्मण बिलाऊ (नर बिलाव) कहलाता है, अर्थात वह पशु है, नीच है।।15।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में भी ब्राह्मण को अपने वास्तविक गुणों को अपनाए रखने की बात कही है। अपने ब्राह्मण गुणों से अलग हटकर जो उपरोक्त छल-प्रपंच के कार्य में लिप्त हो जाता है वह पशु समान हो जाता है। वापी - कूप - तडागानामाराम - सुर - वेश्मनाम्। उच्छेदने निराऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते॥ बावड़ी, कुआं, तालाब, बगीचा और देव-मन्दिर को 124
निर्भय होकर तोड़ने वाला ब्राह्मण म्लेच्छ (नीच) कहलाता है।।16।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के द्वारा भी ब्राह्मण कर्तव्य का बोध कराया है। अपने वास्तविक कर्तव्य से विमुख होकर जो ब्राह्मण आक्रांताओं ( हमलावरों) जैसा तोड़-फोड़ का कार्य करता है, वह ब्राह्मण न रहकर स्वयं भी म्लेच्छ हो जाता है। देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराऽभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥ देवता का धन, गुरु का धन, दूसरे की स्त्री के साथ प्रसंग (संभोग) करने वाला और सभी जीवों में निर्वाह करने अर्थात सबका अन्न खाने वाला ब्राह्मण चांडाल कहलाता है।।17।। इन दिनों पूजा-स्थलों की आय को भी कुछ लोग हड़प कर जाते हैं। वे किसी चाण्डाल से कम नहीं होते। देयं भोज्यधनं सदा सुकृतिभिर्नो संतिव्यं कदा, श्रीकर्णस्य बलेश्र्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्तिः स्थिता। अस्माकं मधु दानभोगरहितं नष्टं चिरात् संचितम्, निर्वाणादिति पाणिपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः॥ भाग्यशाली पुण्यात्मा लोगों को खाद्य-सामग्री और धन-धान्य आदि का संग्रह न करके, उसे अच्छी प्रकार से दान करना चाहिए। दान देने से कर्ण, दैत्यराज बलि और विक्रमादित्य जैसे राजाओं की कीर्ति आज तक बनी हुई है। इसके विपरीत शहद का संग्रह करने वाली मधुमक्खियां जब अपने द्वारा संग्रहीत मधु को किसी कारण से नष्ट हुआ देखती हैं तो वे अपने पैरों को रगड़ते हुए कहती हैं कि हमने न तो अपने मधु का उपयोग किया और न किसी को दिया ही।।18।। 125 CC0 Vasisththa Tripathi Collection Digitized by eGangotri
यहां पैरों के रगड़ने से तात्पर्य 'हाथ मलने' से है, अर्थात पश्चाताप करने से है। बुद्धिमान व्यक्ति खाद्य-सामग्री और धन-धान्य का संग्रह अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए अर्थात परोपकार के लिए करते हैं, जरूरतमंदों को देने के लिए करते हैं और अपनी इस परोपकारी भावना से संसार में अपना नाम अमर कर जाते हैं। इस प्रकार यहां आचार्य चाणक्य ने दान के महत्व का प्रतिपादन किया है। 126
॥ अथ द्वादश अध्याय ॥ सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी, सुधनं सन्मित्रं स्वयोषिति रतिः स्वाऽऽज्ञापराः सेवकाः आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे, साधोः संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥ घर आनन्द से युक्त हो, संतान बुद्धिमान हो, पत्नी मधुर वचन बोलने वाली हो, इच्छापूर्ति के लायक धन हो, पत्नी के प्रति प्रेम भाव हो, आज्ञाकारी सेवक हो, अतिथि का सत्कार और श्री शिव का पूजन प्रतिदिन हो, घर में मिष्ठान व शीतल जल मिला करे और महात्माओं का सत्संग प्रतिदिन मिला करे तो ऐसा गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों से अधिक धन्य है। ऐसे घर का स्वामी अत्यंत सुखी और सौभाग्यशाली होता है॥1॥ जहां सदा आनंद की तरंगें उठती हैं, पुत्र और पुत्रियां बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणी, परिश्रम से कमाया विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा मिलती हो। 127
अतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे, ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है। आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्च यत् श्रद्धया स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति राजन् यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥ जो व्यक्ति दुःखी ब्राह्मणों पर दयामय होकर अपने मन से दान देता है, वह अनन्त होता है। हे राजन! ब्राह्मणों को जितना दान दिया जाता है, वह उतने से कई गुना अधिक होकर वापस मिलता है॥२॥ भाव यह है कि यजमान को उदारतापूर्वक दान देना चाहिए। दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शठ्यं सदा दुर्जने, प्रीतिः साधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धृष्टता, इत्थं ये पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितः॥ जो पुरुष अपने वर्ग में उदारता, दूसरे के वर्ग पर दया, दुर्जनों के वर्ग में दुष्टता, उत्तम पुरुषों के वर्ग में प्रेम, दुष्टों से सावधानी, पंडित वर्ग में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, अपने बुजुर्गों के बीच में सहनशक्ति, स्त्री वर्ग में धूर्तता आदि कलाओं में चतुर हैं, ऐसे ही लोगों से इस संसार की मर्यादा बंधी हुई है॥३॥ स्थान और समय के अनुसार जो कार्य करता है, वह चतुर है। हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ, नेत्रे साधुविलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थ गतौ। अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुंगं शिरो, रे रे जम्बुक! मुंच मुंच सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः॥ दोनों हाथ दान देने से रहित, दोनों काल वेदशास्त्रों को 128
सुनने के विरोधी, दोनों नेत्र महात्माओं के दर्शन से वंचित, दोनों पैर तीर्थयात्रा से दूर और केवल अन्याय के द्वारा कमाए धन से पेट भरकर अंहकार करने वाले, हे रंगे सियार! निन्दा के योग्य इस नीच शरीर को छोड़ दे॥4॥ जो व्यक्ति दया, दान, धर्म से वंचित होकर गलत तरीके से कमाए धन पर अहंकार करके इतराता है, वह नीच है। ऐसे व्यक्ति को अपने शरीर से मोह नहीं करना चाहिए। भाव यह है कि मनुष्य को इस शरीर से अच्छे कर्म करने चाहिए। येषां श्रीमद्यशोदासुत-पद-कमले नास्ति भक्तिर्नराणाम्, येषामाभीरकन्या प्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा। तेषां श्रीकृष्णलीला ललितरसकथा सादरौ नैव कर्णौ, धिक्तान् धिक्तान् धिगेतान्, कथयति सततं कीर्तनस्था मृदंग॥ जिनकी भक्ति यशोदा के पुत्र (श्रीकृष्ण) के चरणकमलों में नहीं है, जिनकी जिह्वा अहीरों की कन्याओं (गोपियों) के प्रिय (श्री गोविन्द) के गुणगान नहीं करती, जिनके कान परमानन्द स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र की लीला तथा मधुर रसमयी कथा को आदरपूर्वक सुनने में नहीं हैं, ऐसे लोगों को मृदंग की थाप, धिक्कार है, धिक्कार है (धिक्तान्-धक्तान्) कहती है॥5॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मृदंग वाद्य की ध्वनि से बहुत अच्छी उपमा दी है। मृदंग से आवाज निकलती है 'धिक्तान्' इसका संस्कृत में अर्थ है 'उन्हें धिक्कार है'। इसके आगे कवि कल्पना करता है कि जिन लोगों का भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अनुराग नहीं, जिनकी जिह्वा को श्री राधाजी और गोपियों के गुणगान में आनंद नहीं आता, जिनके कान श्रीकृष्ण की सुंदर कथा को सुनने के लिए सदा उत्सुक नहीं रहते, मृदंग भी उन्हें 'धिक्कार है, धिक्कार है' कहता है। वस्तुतः जो 129 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
व्यक्ति जीवन में प्रभु का गुणगान नहीं करता, उसे धि क्कार है, उसका जीवन व्यर्थ है। पत्रं नैव यदा करीलविटपे दोषो वसन्तस्य किं ? नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥ वसंत ऋतु में यदि करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं आते तो इसमें वसंत का क्या दोष है? सूर्य सबको प्रकाश देता है, पर यदि दिन में उल्लू को दिखाई नहीं देता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? इसी प्रकार वर्षा का जल यदि चातक के मुंह में नहीं पड़ता तो इसमें मेघों का क्या दोष है? इसका अर्थ यही है कि ब्रह्मा ने भाग्य में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है?॥6॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि भाग्य प्रबल है, अटल है। उसके लिखे को कोई नहीं मिटा सकता। सत्संगाद् भवति हि साधुता खलानां, साधूनां न हि खलसंगयात् खलत्वम्। आमोदं कुसुम - भवं मृदेव धत्ते, मृद्गन्धं न हि कुसुमानि धारयन्ति॥ अच्छी संगति से दुष्टों में भी साधुता आ जाती है। उत्तम लोग दुष्ट के साथ रहने के बाद भी नीच नहीं होते। फूल की सुगंध को मिट्टी तो ग्रहण कर लेती है, पर मिट्टी की गंध को फूल ग्रहण नहीं करता॥7॥ भाव यह है कि जिस प्रकार मिट्टी फूल की खुशबू तो ग्रहण कर लेती है परंतु मिटी की गंध को फूल ग्रहण नहीं करते 130 CC0. Vashistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
उसी प्रकार सत्संगति का प्रभाव दुष्ट पर पड़ता है, पर दुष्टता का प्रभाव साधु लोगों पर नहीं पड़ता। साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः। कालेन फलति तीर्थं सद्यः साधुसमागमः॥ साधु अर्थात महान लोगों के दर्शन करना पुण्य तीर्थों के समान है। तीर्थाटन का फल समय से ही प्राप्त होता है, परंतु साधुओं की संगति का फल तत्काल प्राप्त होता है॥ 8 ॥ साधुओं, सज्जनों का दर्शनमात्र भी पुण्यप्रद है, क्योंकि साधु-संत साक्षात् तीर्थ रूप होते हैं। तीर्थ तो समय आने पर फल देते हैं, परंतु साधुओं का दर्शन तो तुरंत फल प्रदान करता है। विप्राऽर्स्मिन् नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणां गणः, को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि। को दक्षः परवित्तदारहरणे सर्वोपि दक्षो जनः, कस्माज्जीवसि हे सखे! विषकृमिन्यायेनजीवाम्यहम्॥ एक ब्राह्मण से किसी ने पूछा—'हे विप्र! इस नगर में बड़ा कौन है ?' ब्राह्मण ने उत्तर दिया—'ताड़ के वृक्षों का समूह।' प्रश्न करने वाले ने एक पल बाद फिर पूछा—'इसमें दानी कौन है ?' उत्तर मिला—' धोबी है। वही प्रातःकाल प्रतिदिन कपड़ा ले जाता है और शाम को दे जाता है।' पूछा गया—'चतुर कौन है ?' उत्तर मिला—'दूसरों की स्त्री को चुराने में सभी चतुर हैं।' आश्चर्य से उसने पूछा—'तो मित्र ! यहां जीवित कैसे रहते हो ?' उत्तर मिला—'मैं जहर के कीड़ों की भांति किसी प्रकार जी रहा हूं।' ।।9।। इस श्लोक में चाणक्य ने सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया है कि वास्तव में डींगें हांकने से कोई बड़ा नहीं CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 131
हो जाता, किसी से कोई चीज मांगकर उसे वापस देने से कोई दानी नहीं बन जाता, परंतु आज की स्थिति तो यही है कि आदमी समाज की विषम परिस्थितियों के मध्य कीड़े-मकोड़ों की भांति अपना जीवन काट रहा है। न विप्रपादोदक-कर्दमानि, न वेदशास्त्र-ध्वनि-गर्जितानि। स्वाहा-स्वधाकार विवर्जितानि, श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि॥ जहां ब्राह्मणों के चरण नहीं धोए जाते अर्थात उनका आदर नहीं किया जाता, जहां वेद-शास्त्रों के श्लोकों की ध्वनि नहीं गूंजती तथा यज्ञ आदि से देव-पूजन नहीं किया जाता, वे घर श्मशान के समान हैं।।10।। जिन घरों में ब्राह्मणों के पैरों को धुलाने वाले जल से कीचड़ नहीं हो जाता, जहां वेदादि शास्त्रों की ध्वनियां नहीं गूंजतीं, वे घर श्मशान के समान हैं। सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्व सा। शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥ सत्य मेरी माता है, पिता मेरा ज्ञान है, धर्म मेरा भाई है, दया मेरी मित्र है, शान्ति मेरी पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है, ये छः मेरे बंधु-बांधव हैं।।11।। मोह-माया से विरक्त होने के उपरान्त व्यक्ति अपने सभी भौतिक तथा सांसारिक रिश्ते-नातों को खत्म कर लेता है, तभी सत्य को वह अपनी माता, ज्ञान को पिता, धर्म को भाई, दया को मित्र, शान्ति को स्त्री और क्षमा को अपना पुत्र बताता है। अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥ सभी शरीर नाशवान हैं, सभी धन-सम्पत्तियां 132 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
चलायमान हैं और मृत्यु निकट है। ऐसे में मनुष्य को सदैव धर्म का संचय करना चाहिए। इस प्रकार यह संसार नश्वर है। केवल सद्कर्म ही नित्य और स्थायी हैं। हमें इन्हीं को अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए।। 12 ।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में धर्म आचरण की महत्ता का वर्णन किया है। शरीर नाशवान है, धन-संपत्ति भी सदा रहने वाली नहीं है, मौत सदा सिरहाने खड़ी है, अतः धर्म का संचय, धर्माचरण करना चाहिए। आमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः। पत्युत्साहयुता नार्याः अहं कृष्ण-रणोत्सवः ॥ निमन्त्रण पाकर ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं, जैसे हरी घास देखकर गौओं के लिए उत्सव अर्थात प्रसन्नता का माहौल बन जाता है। ऐसे ही पति के प्रसन्न होने पर स्त्री के लिए घर में उत्सव का-सा दृश्य उपस्थित हो जाता है, परंतु मेरे लिए भीषण रण में अनुराग रखना उत्सव के समान है। मेरे लिए युद्धरत होना जीवन की सार्थकता है।। 13 ।। आचार्य चाणक्य प्रस्तुत श्लोक में अपने लिए कहते हैं कि मेरे लिए तो भयंकर मार-काट वाला युद्ध ही उत्सव है। भोजन के लिए निमंत्रण मिलना ब्राह्मणों के लिए उत्सव समान। चरने के लिए नई घास गौओं के लिए। पति का उत्साह से युक्त रहना स्त्रियों के लिए और चाणक्य के लिए भयंकर मार-काट वाला युद्ध ही उत्सव के समान है। मातृवत् परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति सः पण्डितः ॥ जो व्यक्ति दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के 133 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri