भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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नहीं होती। जैसे जंगल में सबसे अधिक बलवान होने पर भी सिंह मतवाला होकर खरगोश के द्वारा मारा जाता है॥16॥ 'पंचतंत्र' में यह कथा आई है, जिसमें एक खरगोश अपनी चतुराई से सिंह की परछाई कुएं में दिखाकर, परछाई को उसका प्रतिद्वन्द्वी बता देता है। सिंह कुएं में उस पर छलांग लगा देता है और कुएं में डूबकर मर जाता है, अर्थात बुद्धि बल से बड़ी है। बुद्धि के द्वारा ताकतवर मनुष्य को भी पराजित किया जा सकता है। का चिंता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते, नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निर्मयेत्। इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलं, त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते॥ यदि भगवान जगत के पालनकर्ता हैं तो हमें जीने की क्या चिन्ता है? यदि वे रक्षक न होते तो माता के स्तनों से दूध क्यों निकलता? यही बार-बार सोचकर हे लक्ष्मीपति! अर्थात विष्णु! मैं आपके चरण-कमल में सेवा हेतु समय व्यतीत करना चाहता हूं॥17॥ विष्णु की उपासना के साथ-साथ कर्महीन होकर बैठ जाने की मंशा यहां नहीं है। भगवान उसी के सहायक होते हैं जो कर्म करता है। गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धिस्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम्। यथा सुराणाममृते स्थितेऽपि स्वर्गांगनानामधरासवे रुचिः॥ यद्यपि मेरी बुद्धि देववाणी (संस्कृत) में श्रेष्ठ है, तब भी मैं दूसरी भाषा का लालची हूं। जैसे अमृत पीने पर भी देवताओं की इच्छा स्वर्ग की अप्सराओं के ओष्ट रूपी मद्य को पीने की बनी रहती है॥18॥ 116 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri