भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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भाव यह है कि ब्राह्मण को अपनी साधना तथा अध्यवसाय नहीं त्यागना चाहिए। जो तपस्वी और विद्वान है, वही ब्राह्मण है। माता च कमलादेवी पिता देवो जनार्दनः। बांधवाः विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्॥ जिसकी माता लक्ष्मी है, पिता विष्णु देव हैं, भाई-बंधु विष्णु के भक्त हैं, उनके लिए तीनों लोक ही अपने देश हैं।।14।। भक्त-जनों के लिए तीनों लोक उनके अपने घर के समान ही हैं। विष्णु तथा लक्ष्मी उनके माता-पिता हैं। जिस पर विष्णु-लक्ष्मी की कृपा है और जो उनके भक्तों के मध्य निवास करता है, उसके लिए तीनों लोक उसके पास हैं। एकवृक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमाः। प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना॥ अनेक रंग और रूपों वाले पक्षी सायं काल एक वृक्ष पर आकर बैठते हैं और प्रातः काल दसों दिशाओं में उड़ जाते हैं। ऐसे ही बंधु-बांधव एक परिवार में मिलते हैं और बिछुड़ जाते हैं। इस विषय में शोक कैसा ?।।15।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक के द्वारा कहा है कि जो भी जड़-चेतन इस संसार में जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, जब मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, फिर इसके लिए शोक-संताप कैसा ? प्रलाप कैसा ? प्रकृति के जन्म-मृत्यु से चिंतित होने से कोई लाभ नहीं। बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेश्च कुतो बलम्। वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥ जो बुद्धिमान है, वही बलवान है, बुद्धिहीन के पास शक्ति 115