सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलाक्षादि-तैल-नीलानां कुसुम्भ-मधु-सर्पिषाम्। विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते॥ लाख आदि, तेल, नील, फूल, शहद, घी, मदिरा (शराब) और मांस आदि का व्यापार करने वाला ब्राह्मण शूद्र कहलाता है।।14।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से पूर्व के श्लोक समान ही ब्राह्मण के कर्म से हटकर अन्य कार्य करने का निषेध किया है। तेल, नील, कुमकुम, मधु, घी, मद्य, मांस बेचने का यदि वह कार्य करता है तो वह शूद्र कहलाता है। वैश्य वर्ण में जन्म लेकर यदि कोई उक्त पदार्थों में से कुछ का व्यापार करता हो तो भले ही वैश्य कहलाए, पर ब्राह्मण यदि इनका व्यापार करे तो शूद्र कहलाता है। परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदुः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते॥ दूसरे के कार्य में विघ्न डालकर नष्ट करने वाला, घमण्डी, स्वार्थी, कपटी, झगड़ालू, ऊपर से कोमल और भीतर से निष्ठुर ब्राह्मण बिलाऊ (नर बिलाव) कहलाता है, अर्थात वह पशु है, नीच है।।15।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में भी ब्राह्मण को अपने वास्तविक गुणों को अपनाए रखने की बात कही है। अपने ब्राह्मण गुणों से अलग हटकर जो उपरोक्त छल-प्रपंच के कार्य में लिप्त हो जाता है वह पशु समान हो जाता है। वापी - कूप - तडागानामाराम - सुर - वेश्मनाम्। उच्छेदने निराऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते॥ बावड़ी, कुआं, तालाब, बगीचा और देव-मन्दिर को 124