सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
लाक्षादि-तैल-नीलानां कुसुम्भ-मधु-सर्पिषाम्। विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते॥ लाख आदि, तेल, नील, फूल, शहद, घी, मदिरा (शराब) और मांस आदि का व्यापार करने वाला ब्राह्मण शूद्र कहलाता है।।14।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से पूर्व के श्लोक समान ही ब्राह्मण के कर्म से हटकर अन्य कार्य करने का निषेध किया है। तेल, नील, कुमकुम, मधु, घी, मद्य, मांस बेचने का यदि वह कार्य करता है तो वह शूद्र कहलाता है। वैश्य वर्ण में जन्म लेकर यदि कोई उक्त पदार्थों में से कुछ का व्यापार करता हो तो भले ही वैश्य कहलाए, पर ब्राह्मण यदि इनका व्यापार करे तो शूद्र कहलाता है। परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदुः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते॥ दूसरे के कार्य में विघ्न डालकर नष्ट करने वाला, घमण्डी, स्वार्थी, कपटी, झगड़ालू, ऊपर से कोमल और भीतर से निष्ठुर ब्राह्मण बिलाऊ (नर बिलाव) कहलाता है, अर्थात वह पशु है, नीच है।।15।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में भी ब्राह्मण को अपने वास्तविक गुणों को अपनाए रखने की बात कही है। अपने ब्राह्मण गुणों से अलग हटकर जो उपरोक्त छल-प्रपंच के कार्य में लिप्त हो जाता है वह पशु समान हो जाता है। वापी - कूप - तडागानामाराम - सुर - वेश्मनाम्। उच्छेदने निराऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते॥ बावड़ी, कुआं, तालाब, बगीचा और देव-मन्दिर को 124
निर्भय होकर तोड़ने वाला ब्राह्मण म्लेच्छ (नीच) कहलाता है।।16।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के द्वारा भी ब्राह्मण कर्तव्य का बोध कराया है। अपने वास्तविक कर्तव्य से विमुख होकर जो ब्राह्मण आक्रांताओं ( हमलावरों) जैसा तोड़-फोड़ का कार्य करता है, वह ब्राह्मण न रहकर स्वयं भी म्लेच्छ हो जाता है। देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराऽभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥ देवता का धन, गुरु का धन, दूसरे की स्त्री के साथ प्रसंग (संभोग) करने वाला और सभी जीवों में निर्वाह करने अर्थात सबका अन्न खाने वाला ब्राह्मण चांडाल कहलाता है।।17।। इन दिनों पूजा-स्थलों की आय को भी कुछ लोग हड़प कर जाते हैं। वे किसी चाण्डाल से कम नहीं होते। देयं भोज्यधनं सदा सुकृतिभिर्नो संतिव्यं कदा, श्रीकर्णस्य बलेश्र्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्तिः स्थिता। अस्माकं मधु दानभोगरहितं नष्टं चिरात् संचितम्, निर्वाणादिति पाणिपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः॥ भाग्यशाली पुण्यात्मा लोगों को खाद्य-सामग्री और धन-धान्य आदि का संग्रह न करके, उसे अच्छी प्रकार से दान करना चाहिए। दान देने से कर्ण, दैत्यराज बलि और विक्रमादित्य जैसे राजाओं की कीर्ति आज तक बनी हुई है। इसके विपरीत शहद का संग्रह करने वाली मधुमक्खियां जब अपने द्वारा संग्रहीत मधु को किसी कारण से नष्ट हुआ देखती हैं तो वे अपने पैरों को रगड़ते हुए कहती हैं कि हमने न तो अपने मधु का उपयोग किया और न किसी को दिया ही।।18।। 125 CC0 Vasisththa Tripathi Collection Digitized by eGangotri
यहां पैरों के रगड़ने से तात्पर्य 'हाथ मलने' से है, अर्थात पश्चाताप करने से है। बुद्धिमान व्यक्ति खाद्य-सामग्री और धन-धान्य का संग्रह अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए अर्थात परोपकार के लिए करते हैं, जरूरतमंदों को देने के लिए करते हैं और अपनी इस परोपकारी भावना से संसार में अपना नाम अमर कर जाते हैं। इस प्रकार यहां आचार्य चाणक्य ने दान के महत्व का प्रतिपादन किया है। 126
॥ अथ द्वादश अध्याय ॥ सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी, सुधनं सन्मित्रं स्वयोषिति रतिः स्वाऽऽज्ञापराः सेवकाः आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे, साधोः संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥ घर आनन्द से युक्त हो, संतान बुद्धिमान हो, पत्नी मधुर वचन बोलने वाली हो, इच्छापूर्ति के लायक धन हो, पत्नी के प्रति प्रेम भाव हो, आज्ञाकारी सेवक हो, अतिथि का सत्कार और श्री शिव का पूजन प्रतिदिन हो, घर में मिष्ठान व शीतल जल मिला करे और महात्माओं का सत्संग प्रतिदिन मिला करे तो ऐसा गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों से अधिक धन्य है। ऐसे घर का स्वामी अत्यंत सुखी और सौभाग्यशाली होता है॥1॥ जहां सदा आनंद की तरंगें उठती हैं, पुत्र और पुत्रियां बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणी, परिश्रम से कमाया विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा मिलती हो। 127
अतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे, ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है। आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्च यत् श्रद्धया स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति राजन् यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥ जो व्यक्ति दुःखी ब्राह्मणों पर दयामय होकर अपने मन से दान देता है, वह अनन्त होता है। हे राजन! ब्राह्मणों को जितना दान दिया जाता है, वह उतने से कई गुना अधिक होकर वापस मिलता है॥२॥ भाव यह है कि यजमान को उदारतापूर्वक दान देना चाहिए। दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शठ्यं सदा दुर्जने, प्रीतिः साधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धृष्टता, इत्थं ये पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितः॥ जो पुरुष अपने वर्ग में उदारता, दूसरे के वर्ग पर दया, दुर्जनों के वर्ग में दुष्टता, उत्तम पुरुषों के वर्ग में प्रेम, दुष्टों से सावधानी, पंडित वर्ग में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, अपने बुजुर्गों के बीच में सहनशक्ति, स्त्री वर्ग में धूर्तता आदि कलाओं में चतुर हैं, ऐसे ही लोगों से इस संसार की मर्यादा बंधी हुई है॥३॥ स्थान और समय के अनुसार जो कार्य करता है, वह चतुर है। हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ, नेत्रे साधुविलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थ गतौ। अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुंगं शिरो, रे रे जम्बुक! मुंच मुंच सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः॥ दोनों हाथ दान देने से रहित, दोनों काल वेदशास्त्रों को 128
सुनने के विरोधी, दोनों नेत्र महात्माओं के दर्शन से वंचित, दोनों पैर तीर्थयात्रा से दूर और केवल अन्याय के द्वारा कमाए धन से पेट भरकर अंहकार करने वाले, हे रंगे सियार! निन्दा के योग्य इस नीच शरीर को छोड़ दे॥4॥ जो व्यक्ति दया, दान, धर्म से वंचित होकर गलत तरीके से कमाए धन पर अहंकार करके इतराता है, वह नीच है। ऐसे व्यक्ति को अपने शरीर से मोह नहीं करना चाहिए। भाव यह है कि मनुष्य को इस शरीर से अच्छे कर्म करने चाहिए। येषां श्रीमद्यशोदासुत-पद-कमले नास्ति भक्तिर्नराणाम्, येषामाभीरकन्या प्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा। तेषां श्रीकृष्णलीला ललितरसकथा सादरौ नैव कर्णौ, धिक्तान् धिक्तान् धिगेतान्, कथयति सततं कीर्तनस्था मृदंग॥ जिनकी भक्ति यशोदा के पुत्र (श्रीकृष्ण) के चरणकमलों में नहीं है, जिनकी जिह्वा अहीरों की कन्याओं (गोपियों) के प्रिय (श्री गोविन्द) के गुणगान नहीं करती, जिनके कान परमानन्द स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र की लीला तथा मधुर रसमयी कथा को आदरपूर्वक सुनने में नहीं हैं, ऐसे लोगों को मृदंग की थाप, धिक्कार है, धिक्कार है (धिक्तान्-धक्तान्) कहती है॥5॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मृदंग वाद्य की ध्वनि से बहुत अच्छी उपमा दी है। मृदंग से आवाज निकलती है 'धिक्तान्' इसका संस्कृत में अर्थ है 'उन्हें धिक्कार है'। इसके आगे कवि कल्पना करता है कि जिन लोगों का भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अनुराग नहीं, जिनकी जिह्वा को श्री राधाजी और गोपियों के गुणगान में आनंद नहीं आता, जिनके कान श्रीकृष्ण की सुंदर कथा को सुनने के लिए सदा उत्सुक नहीं रहते, मृदंग भी उन्हें 'धिक्कार है, धिक्कार है' कहता है। वस्तुतः जो 129 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
व्यक्ति जीवन में प्रभु का गुणगान नहीं करता, उसे धि क्कार है, उसका जीवन व्यर्थ है। पत्रं नैव यदा करीलविटपे दोषो वसन्तस्य किं ? नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥ वसंत ऋतु में यदि करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं आते तो इसमें वसंत का क्या दोष है? सूर्य सबको प्रकाश देता है, पर यदि दिन में उल्लू को दिखाई नहीं देता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? इसी प्रकार वर्षा का जल यदि चातक के मुंह में नहीं पड़ता तो इसमें मेघों का क्या दोष है? इसका अर्थ यही है कि ब्रह्मा ने भाग्य में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है?॥6॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि भाग्य प्रबल है, अटल है। उसके लिखे को कोई नहीं मिटा सकता। सत्संगाद् भवति हि साधुता खलानां, साधूनां न हि खलसंगयात् खलत्वम्। आमोदं कुसुम - भवं मृदेव धत्ते, मृद्गन्धं न हि कुसुमानि धारयन्ति॥ अच्छी संगति से दुष्टों में भी साधुता आ जाती है। उत्तम लोग दुष्ट के साथ रहने के बाद भी नीच नहीं होते। फूल की सुगंध को मिट्टी तो ग्रहण कर लेती है, पर मिट्टी की गंध को फूल ग्रहण नहीं करता॥7॥ भाव यह है कि जिस प्रकार मिट्टी फूल की खुशबू तो ग्रहण कर लेती है परंतु मिटी की गंध को फूल ग्रहण नहीं करते 130 CC0. Vashistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
उसी प्रकार सत्संगति का प्रभाव दुष्ट पर पड़ता है, पर दुष्टता का प्रभाव साधु लोगों पर नहीं पड़ता। साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः। कालेन फलति तीर्थं सद्यः साधुसमागमः॥ साधु अर्थात महान लोगों के दर्शन करना पुण्य तीर्थों के समान है। तीर्थाटन का फल समय से ही प्राप्त होता है, परंतु साधुओं की संगति का फल तत्काल प्राप्त होता है॥ 8 ॥ साधुओं, सज्जनों का दर्शनमात्र भी पुण्यप्रद है, क्योंकि साधु-संत साक्षात् तीर्थ रूप होते हैं। तीर्थ तो समय आने पर फल देते हैं, परंतु साधुओं का दर्शन तो तुरंत फल प्रदान करता है। विप्राऽर्स्मिन् नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणां गणः, को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि। को दक्षः परवित्तदारहरणे सर्वोपि दक्षो जनः, कस्माज्जीवसि हे सखे! विषकृमिन्यायेनजीवाम्यहम्॥ एक ब्राह्मण से किसी ने पूछा—'हे विप्र! इस नगर में बड़ा कौन है ?' ब्राह्मण ने उत्तर दिया—'ताड़ के वृक्षों का समूह।' प्रश्न करने वाले ने एक पल बाद फिर पूछा—'इसमें दानी कौन है ?' उत्तर मिला—' धोबी है। वही प्रातःकाल प्रतिदिन कपड़ा ले जाता है और शाम को दे जाता है।' पूछा गया—'चतुर कौन है ?' उत्तर मिला—'दूसरों की स्त्री को चुराने में सभी चतुर हैं।' आश्चर्य से उसने पूछा—'तो मित्र ! यहां जीवित कैसे रहते हो ?' उत्तर मिला—'मैं जहर के कीड़ों की भांति किसी प्रकार जी रहा हूं।' ।।9।। इस श्लोक में चाणक्य ने सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया है कि वास्तव में डींगें हांकने से कोई बड़ा नहीं CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 131
हो जाता, किसी से कोई चीज मांगकर उसे वापस देने से कोई दानी नहीं बन जाता, परंतु आज की स्थिति तो यही है कि आदमी समाज की विषम परिस्थितियों के मध्य कीड़े-मकोड़ों की भांति अपना जीवन काट रहा है। न विप्रपादोदक-कर्दमानि, न वेदशास्त्र-ध्वनि-गर्जितानि। स्वाहा-स्वधाकार विवर्जितानि, श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि॥ जहां ब्राह्मणों के चरण नहीं धोए जाते अर्थात उनका आदर नहीं किया जाता, जहां वेद-शास्त्रों के श्लोकों की ध्वनि नहीं गूंजती तथा यज्ञ आदि से देव-पूजन नहीं किया जाता, वे घर श्मशान के समान हैं।।10।। जिन घरों में ब्राह्मणों के पैरों को धुलाने वाले जल से कीचड़ नहीं हो जाता, जहां वेदादि शास्त्रों की ध्वनियां नहीं गूंजतीं, वे घर श्मशान के समान हैं। सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्व सा। शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥ सत्य मेरी माता है, पिता मेरा ज्ञान है, धर्म मेरा भाई है, दया मेरी मित्र है, शान्ति मेरी पत्नी है और क्षमा मेरा पुत्र है, ये छः मेरे बंधु-बांधव हैं।।11।। मोह-माया से विरक्त होने के उपरान्त व्यक्ति अपने सभी भौतिक तथा सांसारिक रिश्ते-नातों को खत्म कर लेता है, तभी सत्य को वह अपनी माता, ज्ञान को पिता, धर्म को भाई, दया को मित्र, शान्ति को स्त्री और क्षमा को अपना पुत्र बताता है। अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥ सभी शरीर नाशवान हैं, सभी धन-सम्पत्तियां 132 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
चलायमान हैं और मृत्यु निकट है। ऐसे में मनुष्य को सदैव धर्म का संचय करना चाहिए। इस प्रकार यह संसार नश्वर है। केवल सद्कर्म ही नित्य और स्थायी हैं। हमें इन्हीं को अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए।। 12 ।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में धर्म आचरण की महत्ता का वर्णन किया है। शरीर नाशवान है, धन-संपत्ति भी सदा रहने वाली नहीं है, मौत सदा सिरहाने खड़ी है, अतः धर्म का संचय, धर्माचरण करना चाहिए। आमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः। पत्युत्साहयुता नार्याः अहं कृष्ण-रणोत्सवः ॥ निमन्त्रण पाकर ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं, जैसे हरी घास देखकर गौओं के लिए उत्सव अर्थात प्रसन्नता का माहौल बन जाता है। ऐसे ही पति के प्रसन्न होने पर स्त्री के लिए घर में उत्सव का-सा दृश्य उपस्थित हो जाता है, परंतु मेरे लिए भीषण रण में अनुराग रखना उत्सव के समान है। मेरे लिए युद्धरत होना जीवन की सार्थकता है।। 13 ।। आचार्य चाणक्य प्रस्तुत श्लोक में अपने लिए कहते हैं कि मेरे लिए तो भयंकर मार-काट वाला युद्ध ही उत्सव है। भोजन के लिए निमंत्रण मिलना ब्राह्मणों के लिए उत्सव समान। चरने के लिए नई घास गौओं के लिए। पति का उत्साह से युक्त रहना स्त्रियों के लिए और चाणक्य के लिए भयंकर मार-काट वाला युद्ध ही उत्सव के समान है। मातृवत् परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति सः पण्डितः ॥ जो व्यक्ति दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के 133 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अध्याय १३-१५: भाग्य-कर्म भेद व विद्वान प्रतिष्ठा
धन को ढेले (कंकड़) के समान और सभी जीवों को अपने समान देखता है, वही पंडित है, विद्वान है।। 14।। दूसरे की स्त्री का मोह और दूसरे के धन का लालच बहुत प्रबल होता है, परंतु जो उनमें आसक्त न होकर परोपकार करता है, सभी जीवों को अपना समझता है, वास्तव में वही विद्वान है। धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता, मित्रेऽवंचकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगंभीरता। आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञानता, रूपे सुन्दरता शिवे भजनता स्वभ्यस्ति भो राघवः॥ महर्षि वशिष्ठ राम से कहते हैं—'हे राम! धर्म के निर्वाह में सदैव तत्पर रहने, मधुर वचनों का प्रयोग करने, दान में रुचि, मित्र से निश्छल व्यवहार करने, गुरु के प्रति सदैव विनम्रता रखने, चित्त में अत्यन्त गंभीरता को बनाए रखने, ओछेपन को त्यागने, आचार-विचार में पवित्रता रखने, गुण ग्रहण करने के प्रति सदैव आग्रह रखने, शास्त्रों में निपुणता प्राप्त करने तथा शिव के प्रति सदा भक्ति-भाव रखने के गुण केवल तुम्हारे भीतर ही दिखलाई पड़ते हैं इसीलिए लोग तुम्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं।'।। 15।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में सज्जनता की सही पहचान बताई है। परमेश्वर (ईश्वर) की भक्ति तथा अन्य अच्छी बातें और संस्कार सज्जनों में दृष्टिगोचर होने चाहिए। काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः सूर्यस्तीव्रकरः शशी क्षयकरः क्षारो हि वारां निधिः। कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्यं पशुः कामगौः, नैतास्ते तुलयामि भो रघुपते! कस्योपमा दीयते॥ हे रघुपति ! राम! कल्पवृक्ष काष्ठ है, सुमेरू पर्वत है, 134 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri
चिन्तामणि पत्थर है, सूर्य तीक्ष्ण किरणों वाला है, चन्द्रमा क्षीण होता रहता है, समुद्र खारा है, कामदेव अनंग (बिना शरीर का) है, राजा बलि दैत्यपुत्र है और कामधेनु पशु है। ये सभी उत्तम हैं, परंतु मैं जब आपकी तुलना करता हूं प्रभु! तो आपकी किससे उपमा करूं, यह मेरी समझ में नहीं आता, अर्थात प्रभु! आपकी उपमा तो किसी से भी नहीं दी जा सकती। यह रामोपासना का सुंदर श्लोक है।।16।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में भगवान राम के प्रति अपार श्रद्धा प्रकट की है। ईश्वर अपरम्पार है, उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम्। अनृतं द्यूतकारेभ्यः स्त्रीभ्यः शिक्षेत् कैतवम्॥ राजपुत्रों से नम्रता, पंडितों से मधुर वचन, जुआरियों से असत्य बोलना और स्त्रियों से धूर्तता सीखनी चाहिए।।17।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि राजपुत्रों में अपने पिता के संस्कारस्वरूप नम्रता के गुण आते हैं, पंडितों में बोलने का उत्तम ढंग मिलता है, इन्हें सीखने के रूप में इंसान को अपनाना चाहिए। अनालोक्य व्ययं कर्ता ह्यनाथः कलहप्रियः। आतुरः सर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति॥ बिना विचार के खर्च करने वाला, अकेले रहकर झगड़ा करने वाला और सभी जगह व्याकुल रहने वाला मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।।18।। प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने अनेक उपयोगी बातें बताई हैं। उनके अनुसार आय के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए। अकेले में 135 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थात बिना हिमायती के शत्रु से झगड़ा करना उचित नहीं है। हर समय चिन्ता में रहने से स्वास्थ्य क्षीण हो जाता है और आदमी असमय में ही अपने आपको खत्म कर लेता है। नाहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्। आहारो ही मनुष्याणां जन्मना सह जायते ॥ बुद्धिमान पुरुष को भोजन की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उसे केवल एक धर्म का ही चिन्तन-मनन करना चाहिए। वास्तव में मनुष्य का आहार (मां का दूध) तो उसके जन्म के साथ-साथ ही पैदा होता है॥19॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में धर्म के पालन अर्थात ध र्म कमाने पर जोर दिया है, क्योंकि मृत्यु के बाद धर्म ही साथ जाता है। बुद्धिमान मनुष्य को अपने आहार, भोजन के संबंध में सोच-विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य का आहार तो उसके जन्म के साथ ही उत्पन्न हो जाता है। उसे तो केवल धर्म का ही चिंतन करना चाहिए, क्योंकि यही उसके अपने अर्जित करने का विषय होता है। जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥ धन और अन्न के व्यवहार में, विद्या ग्रहण करने में, भोजन करने में और व्यवहार में जो व्यक्ति लज्जा नहीं करता, वह सदैव सुखी रहता है॥20॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से ज्ञान दिया है कि मनुष्य को धर्म के लिए भी थोड़ा समय अपने व्यस्त जीवन में निकालना चाहिए। थोड़ा-थोड़ा ही बहुत हो जाता है। 136 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
वयसः परिणामेऽपि यः खलः खलः एव सः। सुपक्वमपि माधुर्यं नोपयातीन्द्रवारुणम्॥ जो दुष्ट है, वह उम्र के अन्तिम पड़ाव तक दुष्ट ही रहता है। जिस प्रकार इन्द्रायण का फल पक जाने पर भी अपनी कटुता नहीं छोड़ता और मीठा नहीं हो जाता।।21।। यह किसी-किसी का स्वाभाविक गुण बन जाता है जो जीवन-भर उसका पीछा नहीं छोड़ता। वह जैसा है आखिर तक वैसा ही रहता है। 137
॥अथ त्रयोदश अध्याय ॥ मुहूर्तंमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा। न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना॥ उत्तम कर्म करते हुए एक पल का जीवन भी श्रेष्ठ है, परंतु दोनों लोकों (लोक-परलोक) में दुष्कर्म करते हुए कल्प भर का जीवन (हजारों वर्षों का जीना) भी श्रेष्ठ नहीं है॥1॥ भाव यही है कि मनुष्य को जितना भी जीवन मिला है, उसे श्रेष्ठ कर्मों में ही लगाना उचित है। गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः॥ बीते हुए का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य में जो कुछ होने वाला है, उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। आए हुए समय को देखकर ही विद्वान लोग किसी कार्य में लगते हैं॥2॥ इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो वर्तमान के संबंध में ही सोच-विचारकर कार्य करता है, अर्थात जो वर्तमान में जीता है, भूत और भविष्य की चिन्ता नहीं करता। 138
स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता। ज्ञातयः स्वन्न-पानाभ्यां वाक्यदानेन पण्डिताः॥ उत्तम स्वभाव से ही देवता, सज्जन और पिता संतुष्ट होते हैं। बंधु-बांधव खान-पान से और श्रेष्ठ वार्तालाप से पंडित अर्थात विद्वान प्रसन्न होते हैं। मनुष्य को अपने मृदुल स्वभाव को बनाए रखना चाहिए॥३॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि जो जैसे प्रसन्न हो उसे वैसे ही प्रसन्न करना चाहिए। विद्वान लोग, सज्जन पुरुष और पिता ये स्वभाव से ही संतुष्ट होते हैं। बंधु-बांधव, खान-पान और पण्डितगण मधुर भाषण (सम्मान देने) से प्रसन्न होते हैं। अहो बत विचित्राणि चरितानि महात्मनाम्। लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च॥ अहो! आश्चर्य है कि बड़ों के स्वभाव विचित्र होते हैं, वे लक्ष्मी को तृण के समान समझते हैं और उसके प्राप्त होने पर, उसके भार से और भी अधिक नम्र हो जाते हैं॥4॥ भाव यह है कि जो महान हैं, वे धन के महत्त्व को कुछ नहीं समझते। उनका स्नेहिल स्वभाव धन से भी ऊंचा होता है। यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्। स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत् सुखम्॥ जिसे किसी से लगाव है, वह उतना ही भयभीत होता है। लगाव दुःख का कारण है। दुःखों की जड़ लगाव है। अतः लगाव को छोड़कर सुख से रहना सीखो॥ 5॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने लगाव को दुखों का मूल कारण बताते हुए स्पष्ट किया है कि जिसे किसी से लगाव 139 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थात मोह हो जाता है, उसके न रहने की शंका से ही उसे भय होने लगता है और यह भय उसे दुःख पहुंचाने वाला होता है। मोह ही सारे कष्टों का जड़ है इसलिए लगाव अर्थात मोह को त्याग देना ही उत्तम है। अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा। द्वावेते सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति॥ भविष्य में आने वाली सम्भावित विपत्ति और वर्तमान में उपस्थित विपत्ति पर जो तत्काल विचार करके उसका समाधान खोज लेते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। इसके अलावा जो ऐसा सोचते रहते हैं कि 'यह होगा, वैसा होगा तथा जो होगा, देखा जाएगा' और कुछ उपाय नहीं करते, वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं॥6॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कर्म करने और मात्र भगवान के भरोसे न बैठने रहने की बात कही है। उनके कहने का भाव यह है कि केवल भाग्य के भरोसे ही नहीं बैठे रहना चाहिए। विपत्ति आने पर या उसके आने की संभावना होने पर तत्काल उपाय कर लेने चाहिए। जो व्यक्ति विपत्ति को भगवान की ओर से रचा गया भाग्य कहकर उसे समाप्त करने का उपाय नहीं करते, वे अंततः नष्ट हो जाते हैं। राज्ञि धर्मिणि धर्मष्ठाः पापे पापाः समे समाः। राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः॥ जैसा राजा होता है, उसकी प्रजा भी वैसी ही होती है। धर्मात्मा राजा के राज्य की प्रजा धर्मात्मा, पापी के राज्य की पापी और मध्यम वर्गीय राजा के राज्य की प्रजा मध्यम अर्थात राजा का अनुसरण करने वाली होती है॥7॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से ज्ञान दिया है कि यदि राजा दुर्बल, शासन चलाने में असमर्थ, 140 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
पापाचारी, शासन तंत्र चलाने में अक्षम है तो शासक वर्ग को प्रजा को लूटने का अच्छा अवसर मिल जाता है। जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्। मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः॥ धर्म से विमुख व्यक्ति जीवित भी मृतक के समान है, परंतु धर्म का आचरण करने वाला व्यक्ति चिरंजीवी होता है॥8॥ भाव यह है कि धर्म का आचरण करने से मनुष्य के सदाचरण युग-युग तक लोगों की जुबान पर रहते हैं और वह व्यक्ति सशरीर न होने पर भी लोगों के दिलों में जीवित रहता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिए। धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥ धर्म, धन, काम, मोक्ष, इनमें से जिसने एक को भी नहीं पाया, उसका जीवन व्यर्थ है॥9॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों का संबंध इस लोक और परलोक, दोनों से है। मनुष्य को अपना जीवन सार्थक करने के लिए इनमें से किसी एक को तो अवश्य ही पाना चाहिए। दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना। अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते॥ नीच मनुष्य दूसरों की यशस्वी अग्नि की तेजी से जलते हैं और उस स्थान पर (उस यश को पाने के स्थान पर) न पहुंचने के कारण उनकी निन्दा करते हैं॥10॥ दूसरों की निन्दा सदैव दुष्ट व्यक्ति ही किया करते हैं। वे दूसरों के यश को देखकर सदैव ईर्ष्या से जलते रहते हैं। 141 CC0- Vasisntha Tripathi Collection, Digitized by eGangotri
बन्धाय विषयाऽऽसक्तं मुक्त्ये निर्विषयं मनः। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः॥ मन को विषयहीन अर्थात् माया-मोह से मुक्त करके ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है क्योंकि मन में विषय-वासनाओं के आवागमन के कारण ही मनुष्य माया-मोह के जाल में आसक्त रहता है। अतः मोक्ष (जीवन-मरण) से छुटकारा पाने के लिए मन का विकाररहित होना आवश्यक है॥11॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में व्याख्या दी है कि मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। अतः मन को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए। देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि। यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥ परम तत्त्वज्ञान प्राप्त होने पर जब मनुष्य देह के अभिमान को छोड़ देता है अर्थात् जब उसे आत्मा-परमात्मा की नित्यता और शरीर की क्षणभंगुरता का ज्ञान हो जाता है तो वह इस शरीर के मोह को छोड़ देता है। तदुपरान्त उसका मन जहां-जहां भी जाता है, वहां-वहां उसे सिद्ध पुरुषों की समाधियों की अनुभूति होती है॥12॥ भाव यह है कि जाग्रत-अवस्था में होते हुए भी वह समाधि जैसी स्थिति में आ जाता है। ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम्। दैवाऽऽयत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत्॥ मन की इच्छा के अनुसार सारे सुख किसको मिलते हैं? अर्थात् किसी को नहीं मिलते। इससे यह सिद्ध होता है कि 'दैव' के ही बस में सब कुछ है। अतः संतोष का ही आश्रय लेना चाहिए। 142
'संतोष सबसे बड़ा धन है। सुख और दुःख में उसे समरस रहना चाहिए। कहा भी है- 'जाहि विध राखे राम, ताहि विध रहिए।' ।।13।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से कहा है कि संतोष ही सुख का मूल है, अतः संतोष धारण करना चाहिए। संतोष से बढ़कर कोई और सुख नहीं होता। सुख के इच्छुक को संतोष का सहारा लेकर अपने-आपको संयम में रखना चाहिए। असंतोष दुख का कारण है। यथा धेनुसहस्रेषु वस्तो गच्छति मारतम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥ जैसे हजारों गायों के मध्य भी बछड़ा अपनी ही माता के पास आता है, उसी प्रकार किए गए कर्म कर्ता के पीछे-पीछे जाते हैं।।14।। आदमी जैसे कर्म करता है, उसे फल भी उसी के कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं। अतः सदैव अच्छे कर्म करके अपना जीवन सुधारना चाहिए। अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम्। जने दहति संसर्गो वने संगविवर्जनम्॥ अव्यवस्थित कार्य करने वाले को न तो समाज में और न वन में सुख प्राप्त होता है क्योंकि समाज में लोग उसे भला-बुरा कहकर जलाते हैं और निर्जन वन में अकेला होने के कारण वह दुःखी होता है।।15।। भाव यह है कि ऐसे व्यक्ति को न तो घर में सुख मिलता है, न संन्यास लेने पर सुख प्राप्त होता है। सच्चा सुख कर्तव्य पथ का निश्चय करके, उस पर चलने में है। 143