सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता। ज्ञातयः स्वन्न-पानाभ्यां वाक्यदानेन पण्डिताः॥ उत्तम स्वभाव से ही देवता, सज्जन और पिता संतुष्ट होते हैं। बंधु-बांधव खान-पान से और श्रेष्ठ वार्तालाप से पंडित अर्थात विद्वान प्रसन्न होते हैं। मनुष्य को अपने मृदुल स्वभाव को बनाए रखना चाहिए॥३॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि जो जैसे प्रसन्न हो उसे वैसे ही प्रसन्न करना चाहिए। विद्वान लोग, सज्जन पुरुष और पिता ये स्वभाव से ही संतुष्ट होते हैं। बंधु-बांधव, खान-पान और पण्डितगण मधुर भाषण (सम्मान देने) से प्रसन्न होते हैं। अहो बत विचित्राणि चरितानि महात्मनाम्। लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च॥ अहो! आश्चर्य है कि बड़ों के स्वभाव विचित्र होते हैं, वे लक्ष्मी को तृण के समान समझते हैं और उसके प्राप्त होने पर, उसके भार से और भी अधिक नम्र हो जाते हैं॥4॥ भाव यह है कि जो महान हैं, वे धन के महत्त्व को कुछ नहीं समझते। उनका स्नेहिल स्वभाव धन से भी ऊंचा होता है। यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्। स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत् सुखम्॥ जिसे किसी से लगाव है, वह उतना ही भयभीत होता है। लगाव दुःख का कारण है। दुःखों की जड़ लगाव है। अतः लगाव को छोड़कर सुख से रहना सीखो॥ 5॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने लगाव को दुखों का मूल कारण बताते हुए स्पष्ट किया है कि जिसे किसी से लगाव 139 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri