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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता। ज्ञातयः स्वन्न-पानाभ्यां वाक्यदानेन पण्डिताः॥ उत्तम स्वभाव से ही देवता, सज्जन और पिता संतुष्ट होते हैं। बंधु-बांधव खान-पान से और श्रेष्ठ वार्तालाप से पंडित अर्थात विद्वान प्रसन्न होते हैं। मनुष्य को अपने मृदुल स्वभाव को बनाए रखना चाहिए॥३॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि जो जैसे प्रसन्न हो उसे वैसे ही प्रसन्न करना चाहिए। विद्वान लोग, सज्जन पुरुष और पिता ये स्वभाव से ही संतुष्ट होते हैं। बंधु-बांधव, खान-पान और पण्डितगण मधुर भाषण (सम्मान देने) से प्रसन्न होते हैं। अहो बत विचित्राणि चरितानि महात्मनाम्। लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च॥ अहो! आश्चर्य है कि बड़ों के स्वभाव विचित्र होते हैं, वे लक्ष्मी को तृण के समान समझते हैं और उसके प्राप्त होने पर, उसके भार से और भी अधिक नम्र हो जाते हैं॥4॥ भाव यह है कि जो महान हैं, वे धन के महत्त्व को कुछ नहीं समझते। उनका स्नेहिल स्वभाव धन से भी ऊंचा होता है। यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्। स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत् सुखम्॥ जिसे किसी से लगाव है, वह उतना ही भयभीत होता है। लगाव दुःख का कारण है। दुःखों की जड़ लगाव है। अतः लगाव को छोड़कर सुख से रहना सीखो॥ 5॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने लगाव को दुखों का मूल कारण बताते हुए स्पष्ट किया है कि जिसे किसी से लगाव 139 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

अर्थात मोह हो जाता है, उसके न रहने की शंका से ही उसे भय होने लगता है और यह भय उसे दुःख पहुंचाने वाला होता है। मोह ही सारे कष्टों का जड़ है इसलिए लगाव अर्थात मोह को त्याग देना ही उत्तम है। अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा। द्वावेते सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति॥ भविष्य में आने वाली सम्भावित विपत्ति और वर्तमान में उपस्थित विपत्ति पर जो तत्काल विचार करके उसका समाधान खोज लेते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। इसके अलावा जो ऐसा सोचते रहते हैं कि 'यह होगा, वैसा होगा तथा जो होगा, देखा जाएगा' और कुछ उपाय नहीं करते, वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं॥6॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कर्म करने और मात्र भगवान के भरोसे न बैठने रहने की बात कही है। उनके कहने का भाव यह है कि केवल भाग्य के भरोसे ही नहीं बैठे रहना चाहिए। विपत्ति आने पर या उसके आने की संभावना होने पर तत्काल उपाय कर लेने चाहिए। जो व्यक्ति विपत्ति को भगवान की ओर से रचा गया भाग्य कहकर उसे समाप्त करने का उपाय नहीं करते, वे अंततः नष्ट हो जाते हैं। राज्ञि धर्मिणि धर्मष्ठाः पापे पापाः समे समाः। राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः॥ जैसा राजा होता है, उसकी प्रजा भी वैसी ही होती है। धर्मात्मा राजा के राज्य की प्रजा धर्मात्मा, पापी के राज्य की पापी और मध्यम वर्गीय राजा के राज्य की प्रजा मध्यम अर्थात राजा का अनुसरण करने वाली होती है॥7॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से ज्ञान दिया है कि यदि राजा दुर्बल, शासन चलाने में असमर्थ, 140 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

पापाचारी, शासन तंत्र चलाने में अक्षम है तो शासक वर्ग को प्रजा को लूटने का अच्छा अवसर मिल जाता है। जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्। मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः॥ धर्म से विमुख व्यक्ति जीवित भी मृतक के समान है, परंतु धर्म का आचरण करने वाला व्यक्ति चिरंजीवी होता है॥8॥ भाव यह है कि धर्म का आचरण करने से मनुष्य के सदाचरण युग-युग तक लोगों की जुबान पर रहते हैं और वह व्यक्ति सशरीर न होने पर भी लोगों के दिलों में जीवित रहता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिए। धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥ धर्म, धन, काम, मोक्ष, इनमें से जिसने एक को भी नहीं पाया, उसका जीवन व्यर्थ है॥9॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों का संबंध इस लोक और परलोक, दोनों से है। मनुष्य को अपना जीवन सार्थक करने के लिए इनमें से किसी एक को तो अवश्य ही पाना चाहिए। दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना। अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते॥ नीच मनुष्य दूसरों की यशस्वी अग्नि की तेजी से जलते हैं और उस स्थान पर (उस यश को पाने के स्थान पर) न पहुंचने के कारण उनकी निन्दा करते हैं॥10॥ दूसरों की निन्दा सदैव दुष्ट व्यक्ति ही किया करते हैं। वे दूसरों के यश को देखकर सदैव ईर्ष्या से जलते रहते हैं। 141 CC0- Vasisntha Tripathi Collection, Digitized by eGangotri

बन्धाय विषयाऽऽसक्तं मुक्त्ये निर्विषयं मनः। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः॥ मन को विषयहीन अर्थात् माया-मोह से मुक्त करके ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है क्योंकि मन में विषय-वासनाओं के आवागमन के कारण ही मनुष्य माया-मोह के जाल में आसक्त रहता है। अतः मोक्ष (जीवन-मरण) से छुटकारा पाने के लिए मन का विकाररहित होना आवश्यक है॥11॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में व्याख्या दी है कि मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। अतः मन को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए। देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि। यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥ परम तत्त्वज्ञान प्राप्त होने पर जब मनुष्य देह के अभिमान को छोड़ देता है अर्थात् जब उसे आत्मा-परमात्मा की नित्यता और शरीर की क्षणभंगुरता का ज्ञान हो जाता है तो वह इस शरीर के मोह को छोड़ देता है। तदुपरान्त उसका मन जहां-जहां भी जाता है, वहां-वहां उसे सिद्ध पुरुषों की समाधियों की अनुभूति होती है॥12॥ भाव यह है कि जाग्रत-अवस्था में होते हुए भी वह समाधि जैसी स्थिति में आ जाता है। ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम्। दैवाऽऽयत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत्॥ मन की इच्छा के अनुसार सारे सुख किसको मिलते हैं? अर्थात् किसी को नहीं मिलते। इससे यह सिद्ध होता है कि 'दैव' के ही बस में सब कुछ है। अतः संतोष का ही आश्रय लेना चाहिए। 142

'संतोष सबसे बड़ा धन है। सुख और दुःख में उसे समरस रहना चाहिए। कहा भी है- 'जाहि विध राखे राम, ताहि विध रहिए।' ।।13।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से कहा है कि संतोष ही सुख का मूल है, अतः संतोष धारण करना चाहिए। संतोष से बढ़कर कोई और सुख नहीं होता। सुख के इच्छुक को संतोष का सहारा लेकर अपने-आपको संयम में रखना चाहिए। असंतोष दुख का कारण है। यथा धेनुसहस्रेषु वस्तो गच्छति मारतम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥ जैसे हजारों गायों के मध्य भी बछड़ा अपनी ही माता के पास आता है, उसी प्रकार किए गए कर्म कर्ता के पीछे-पीछे जाते हैं।।14।। आदमी जैसे कर्म करता है, उसे फल भी उसी के कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं। अतः सदैव अच्छे कर्म करके अपना जीवन सुधारना चाहिए। अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम्। जने दहति संसर्गो वने संगविवर्जनम्॥ अव्यवस्थित कार्य करने वाले को न तो समाज में और न वन में सुख प्राप्त होता है क्योंकि समाज में लोग उसे भला-बुरा कहकर जलाते हैं और निर्जन वन में अकेला होने के कारण वह दुःखी होता है।।15।। भाव यह है कि ऐसे व्यक्ति को न तो घर में सुख मिलता है, न संन्यास लेने पर सुख प्राप्त होता है। सच्चा सुख कर्तव्य पथ का निश्चय करके, उस पर चलने में है। 143

खनित्वा हि खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥ जिस प्रकार फावड़े अथवा कुदाल से खोदकर व्यक्ति धरती के नीचे से जल प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार एक शिष्य गुरु की मन से सेवा करके विद्या प्राप्त कर लेता है।।16।। सेवा और कठोर श्रम से ही फल प्राप्त होता है। बिना साधना के सेवा भी व्यर्थ हो जाती है। अतः सेवा के साथ-साथ कठोर परिश्रम भी आवश्यक है। विद्या प्राप्त करने के लिए गुरु की सेवा करनी चाहिए, तभी शिक्षा की प्राप्ति होती है। कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी। तथापि सुधियश्चाऽऽर्या सुविचार्यैव कुर्वते॥ फल कर्म के अधीन है, बुद्धि कर्म के अनुसार होती है, तब भी बुद्धिमान लोग और महान लोग सोच-विचार करके ही कोई कार्य करते हैं।।17।। किसी भी कार्य को करने से पूर्व अच्छी प्रकार से सोच-समझ लेना चाहिए, तभी कार्य अच्छे होते हैं। संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में संतोष करना चाहिए और विद्या पढ़ने, जप करने और दान देने, इन तीनों में संतोष नहीं करना चाहिए।।18।। भाव यह है कि दान, ईश्वर ध्यान और स्वाध्याय, इनमें कभी भी कंजूसी नहीं करनी चाहिए। जी भरकर दान देना चाहिए और पूर्ण मनोयोग से ईश्वर की आराधना और शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। 144 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—9

एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिवन्दति। श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते॥ जिस गुरु ने एक भी अक्षर पढ़ाया हो, उस गुरु को जो प्रणाम नहीं करता अर्थात उसका सम्मान नहीं करता, ऐसा व्यक्ति कुत्ते की सैकड़ों योनियों को भुगतने के उपरान्त चाण्डाल योनि में जन्म लेता है॥19॥ गुरु का सम्मान करना अत्यन्त आवश्यक है। गुरु का स्थान गोविन्द से भी बड़ा होता है। युगान्ते प्रचलते मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः। साधवः प्रतिपन्नार्थान् न चलन्ति कदाचन॥ प्रलय काल में चाहे मेरु पर्वत डगमगा जाए और कल्प के अन्त में सातों सागर चाहे अपनी मर्यादा छोड़ दें, परंतु महान विभूतियां, श्रेष्ठ साधु अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होते॥20॥ भाव यह है कि बड़े लोगों के सम्मुख कितनी ही विपत्तियां क्यों न आ जाएं, वे अपने लक्ष्य से कभी भी विचलित नहीं होते। जो सोच लेते हैं, उसे करके ही हटते हैं। वे कभी अपनी मान्यताओं, अपने सिद्धान्तों, अपने आदर्शों और अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटते। उनका मार्ग परजन हितकारी होता है और वे जीवन-भर उसी पर चलते रहते हैं। 145

ऽऽअथ चतुर्दश अध्याय ऽऽ पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते॥ इस पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं—जल, अन्न और मधुर वचन! बुद्धिमान व्यक्ति इनकी समझ रखता है, परंतु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं॥1॥ जल और अन्न के बिना आदमी का जीवन बिल्कुल भी संभव नहीं है और मधुर वचनों के बिना समाज में विचरण करना मुश्किल है। कटु वचन कहने वाले का कोई भी आदर नहीं करता। दारिद्र्यरोधदुःखानि बंधनव्यसनानि च। आत्माऽपराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्॥ मनुष्य के अधर्मरूपी वृक्ष (अर्थात शरीर) के फल—दरिद्रता, रोग, दुःख, बंधन (मोह-माया), व्यसन आदि हैं॥2॥ मनुष्य यदि अधर्म के मार्ग पर चलता है तो उसे अपने जीवन में उपर्युक्त दुःखों का सामना करना पड़ता है। 146 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

पुनर्वितं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही। एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥ धन, मित्र, स्त्री और पृथ्वी, ये बार-बार प्राप्त होते हैं, परंतु मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता॥3॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मानव शरीर का महत्त्व बताया है। उनके अनुसार मानव शरीर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त ही प्राप्त होता है। यह अत्यन्त दुर्लभ है। इसमें ईश्वर को स्मरण किया जा सकता है। बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुंजयः। वर्षधाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते॥ यह एक निश्चित तथ्य है कि बहुत-से लोगों का समूह ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है, जैसे वर्षा की धार को धारण करने वाले मेघों के जल को तिनकों के द्वारा (तिनके का बना छप्पर) ही रोका जा सकता है॥4॥ भाव यह है कि एकता में बड़ा बल होता है। वह बड़ी-से-बड़ी शक्ति से टकरा सकता है। जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि। प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः॥ पानी में तेल, दुष्ट व्यक्तियों में गोपनीय बातें, उत्तम पात्र को दिया गया दान और बुद्धिमान के पास शास्त्र-ज्ञान यदि थोड़ा भी हो तो स्वयं वह अपनी शक्ति से विस्तार पा जाता है॥5॥ भाव यह है कि जिस प्रकार पानी में डाला गया जरा-सा तेल भी फैल जाता है, दुष्टों में पहुंची गोपनीय बातें चारों तरफ फैल जाती हैं, उसी प्रकार उत्तम पात्र को दिया गया दान बहुत परोपकार 147 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

करता है और बुद्धिमान का थोड़ा-सा शास्त्र ज्ञान भी काफी लोगों को प्रबुद्ध करता है। ज्ञान का विस्तार इसी प्रकार होता है, अर्थात सभी चीजों का अपना-अपना महत्त्व है। धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्। सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत् को न मुच्येत बंधनात्॥ धार्मिक कथा सुनने पर, श्मशान में चिता को जलते देखकर, रोगी को कष्ट में पड़े देखकर जिस प्रकार वैराग्य भाव उत्पन्न होता है, वह यदि स्थिर रहे तो यह सांसारिक मोह-माया व्यर्थ लगने लगे, परंतु अस्थिर मन श्मशान से लौटने पर फिर से मोह-माया में फंस जाता है॥6॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने सांसारिक मोह-माया से बचने के लिए मन को दृढ़ बनाने की बात कही है। उनके अनुसार अस्थिर मन से संसार से विमुक्त होने की कामना करना कभी सुखकारी नहीं होता। उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी। तादृशी यदि पूर्व स्यात् कस्य न स्यान्महोदयः॥ चिंता करने वाले व्यक्ति के मन में चिंता उत्पन्न होने के बाद की जो स्थिति होती है अर्थात उसकी जैसी बुद्धि हो जाती है, वैसी बुद्धि यदि पहले से ही रहे तो भला किसका भाग्योदय नहीं होगा।।7।। इस श्लोक में चाणक्य ने बताया है कि गलत कार्य करने के उपरान्त पश्चाताप के समय उसकी जैसी निर्मल बुद्धि हो जाती है, यदि वैसी निर्मल बुद्धि पहले से ही रहे तो भला किसका कल्याण नहीं होगा। 148

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्त्तव्यो बहुरत्ना वसुंधरा॥ दान, तपस्या, वीरता, ज्ञान, नम्रता, किसी में ऐसी विशेषता को देखकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में ऐसे अनेक रत्न भरे पड़े हैं॥8॥ भाव यह है कि दुनिया में एक से बढ़कर एक व्यक्ति ऐसे हैं जो दान, तप, वीरता, ज्ञान और संवेदनशीलता में बढ़े-चढ़े हैं। कहां तक आश्चर्य किया जा सकता है। दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः। यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः॥ जो जिसके मन में है, वह उससे दूर रहकर भी दूर नहीं है और जो जिसके हृदय में नहीं है, वह समीप रहते हुए भी दूर है॥9॥ भाव यह है कि सच्चा प्रेम हृदय से होता है, उसमें दूरी का अथवा पास का कोई व्यवधान नहीं होता। सच्चे प्रेम में प्रिय हर समय आंखों के सम्मुख ही रहता है। यस्य चाप्रियमिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्। व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम्॥ जिससे अपना हित साधना हो, उससे सदैव प्रिय बोलना चाहिए जैसे मृग को मारने के लिए बहेलिया मीठे स्वर में गीत गाता है॥10॥ यहां चाणक्य ने कूटनीति की ओर इशारा किया है कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए राजा को सदैव अपने शत्रु से मीठा-व्यवहार करना चाहिए। उससे मधुर-वाणी में बात करनी चाहिए। 149

अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः। सेव्यन्ता मध्यभागेन वह्निन्गुरुः स्त्रियः॥ राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री, इनसे सामान्य व्यवहार करना चाहिए क्योंकि अत्यंत समीप होने पर ये नाश के कारण होते हैं और दूर रहने पर इनसे कोई फल प्राप्त नहीं होता।।11।। भाव यह है कि इनसे व्यवहार करते समय मध्यम मार्ग अपनाएं। 'न नीम से कड़वा और न गुड़ से मीठा।' ज्यादा दूरी भी नहीं और ज्यादा पास भी नहीं। अग्निरापः स्त्रियो मूर्खः सर्पा राजकुलानि च। नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट्॥ अग्नि, पानी, स्त्रियां, मूर्ख, सांप और राजाकुल से निकट संबंध सावधानी के साथ करना चाहिए क्योंकि ये छः तत्काल प्राणों को हरने वाले हैं।। 12।। प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने अग्नि, पानी, स्त्रियां, मूर्ख, सांप और राजवंश से सतर्क रहने की बात कही है। उनके अनुसार अग्नि के प्रति, जल के प्रति, स्त्री के प्रति, मूर्ख व्यक्ति के प्रति, सर्प के प्रति और राजवंश के प्रति यदि जरा भी असावधानी दिखाई तो प्राण संकट में पड़ सकते हैं। इनसे बहुत सावधान रहना चाहिए। स जीवति गुना यस्य यस्य धर्मः स जीवति। गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम्॥ जिसके पास गुण हैं, जिसके पास धर्म है, वही जीवित है। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निरर्थक है।। 13।। चाणक्य ने मनुष्य में गुण के उपस्थित होने पर बल दिया है। गुण से तात्पर्य दयाभाव, जगत-कल्याण की भावना तथा परोपकार है। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 150

यदीच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा। पंचदशास्येभ्यो गां चरन्ती निवारय॥ यदि एक ही कर्म से समस्त संसार को वश में करना चाहते हो तो पंद्रह मुखों से विचरण करने वाले मन को रोको, अर्थात उसे वश में करो। पंद्रह मुख हैं—मुंह, आंख, कान, नाक, जीभ, त्वक्, हाथ, पैर, लिंग, गुदा, रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द।।14। कहीं-कहीं इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में 'परापवादशस्येभ्यो' शब्द भी मिलता है, तब इसका अर्थ 'परनिन्दा' हो जाएगा। तब अर्थ होगा—'यदि एक ही कर्म से सारे संसार को वश में करना चाहते हो तो परनिन्दा करना बंद कर दो। मन को वश में करना और परनिन्दा न करना, दोनों ही उचित लगते हैं। ऐसा करके आपके हाथों में वशीकरण मंत्र की शक्ति आ सकती है। प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम्। आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पंडितः॥ जो प्रस्ताव के योग्य बातों को, प्रभाव के अनुसार प्रिय कार्य को या वचन को और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है।।15।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में बताया है कि प्रसंग अनुकूल बात करनी चाहिए, यदि प्रसन्नता का मौका है तो उसमें प्रसन्नता की बातें होनी चाहिए। इसी तरह अन्य योग्यताओं का वर्णन किया है। एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः। कुणपः कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥ एक ही वस्तु को तीन दृष्टियों से देखा जा सकता है। जैसे सुंदर स्त्री को योगी मृतक के रूप में देखता है, कामुक व्यक्ति उसे 151 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

कामिनी के रूप में देखता है और कुत्ते के द्वारा वह मांस के रूप में देखी जाती है।। 16।। भाव यह है कि नारी का सौंदर्य दृष्टि भ्रममात्र है। प्रत्येक व्यक्ति हर चीज को अपनी-अपनी दृष्टि से देखता है। सुसिद्धमौषधं धर्म गृहच्छिद्रं च मैथुनम्। कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ बुद्धिमान वही है जो अति सिद्ध दवा को, धर्म के रहस्य को, घर के दोष को, मैथुन अर्थात संभोग की बात को, स्वादहीन भोजन को और अतिकष्टकारी मृत्यु को किसी को न बताए। भाव यह है कि कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें समाज में छिपाकर ही रखना चाहिए।। 17।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से इस बात को बताया है कि छुपाने योग्य बातों को न छुपाकर मनुष्य समाज में हंसी का पात्र बनता है, कुछ मामलों में नुकसान उठाता है। तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः। यावत्सर्वजनानन्द दायिनी वाक् न प्रवर्तते॥ कोयल की वाणी तभी तक मौन रहती है, जब तक कि सभी जनों को आनन्द देने वाली वाणी प्रारम्भ नहीं हो जाती।। 18।। भाव यह है कि आम्रमंजरी के फूलने के बाद ही कोयल कूकती है क्योंकि आम्रमंजरी की भीनी सुगंध से आनन्दित होकर वसंत ऋतु में लोगों की मीठी वाणी भी चहकने लगती है। धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्। सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति॥ धर्म, धन, अन्न, गुरु का उपदेश और गुणकारी औषधि का संग्रह अच्छी प्रकार से करना चाहिए। अन्यथा जीवन का 152

कल्याण नहीं होता। जीवन नष्ट हो जाता है।।19।। बिना धर्म और गुरु उपदेश के मानसिक सुख मृतप्राय है और बिना अन्न और धन के जीवन का भौतिक आधार नष्ट हो जाता है। त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्। कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥ दुष्टों का साथ त्यागो, सज्जनों का साथ करो, रात-दिन धर्म का आचरण करो और प्रतिदिन इस अनित्य संसार में नित्य परमात्मा के विषय में विचार करो, उसे स्मरण करो।।20।। सद्‍संगति और धर्माचरण करते हुए नित्य परमात्मा को याद करना चाहिए और इस संसार की नश्वरता को समझना चाहिए। सद्‍संगति के सामने दुष्टों का साथ कुछ भी नहीं है। 153

॥ अथ पंचदश अध्याय ॥ यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु। तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः॥ जिसका हृदय सभी प्राणियों पर दया करने हेतु द्रवित हो उठता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटा और भस्म लगाने की क्या जरूरत है ?।।1।। भाव यह है कि हमें सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए, उनसे स्नेह करना चाहिए। जो ऐसा करता है, उसका स्थान परमात्मा के समकक्ष हो जाता है। एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्। पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा चाऽनृणी भवेत्॥ जो गुरु एक ही अक्षर अपने शिष्य को पढ़ा देता है, उसके लिए इस पृथ्वी पर कोई अन्य चीज ऐसी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जिसे वह गुरु को देकर उऋण हो सके ।।2।। भाव यह है कि जो गुरु अपने शिष्य को एक अक्षर का यह उपदेश दे देता है— 'तत्त्वमसि' अर्थात 'तुम ब्रह्म हो।' आत्मा तुम्हारा ही रूप है, अंश है। यह शरीर तो नाशवान है, अनित्य 154

है, जबकि ब्रह्म 'नित्य' है, अजन्मा है, सदैव से है और अनन्त काल तक रहेगा। उसका कोई ओर-छोर नहीं, तो यह उपदेश पाने के बाद शिष्य के लिए किसी अन्य उपदेश को पाने की आवश्यकता नहीं रह जाती। खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया। उपानान्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्॥ दुष्टों और कांटों से बचने के दो ही उपाय हैं, जूतों से उन्हें कुचल डालना व उनसे दूर रहना॥३॥ भाव यह है कि दुष्ट और कांटे सदैव कष्ट ही पहुंचाने वाले होते हैं। इनसे बचकर रहना ही ठीक रहता है। यदि इनसे सामना हो ही जाए तो इन्हें जूतों से कुचल डालना चाहिए। कुचैलिनं दंतमलोपसृष्टं, बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं च। सूर्योदये चास्तमिते शयानं, विमुंचति श्रीर्यदि चक्रपाणिः॥ गंदे वस्त्र धारण करने वाले, दांतों पर मैल जमाए रखने वाले, अत्यधिक भोजन करने वाले, कठोर वचन बोलने वाले, सूर्योदय से सूर्यास्त तक सोने वाले को, चाहे वह साक्षात विष्णु ही क्यों न हो, लक्ष्मी त्याग देती है॥4॥ ऐसे व्यक्ति आलसी, कामचोर, पेटू, क्रोधी और निकम्मे होते हैं। ऐसे लोगों के पास धन-सम्पति कभी नहीं आती। यदि आती भी है तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, परंतु जो व्यक्ति स्वच्छ रहेगा, कर्मठ होगा, वही धन-वैभव जुटाने में कामयाब होता है। त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं, दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च। तं चार्थवन्तं पुनराश्रयंते, अर्थो हि लोके पुरुषस्य बंधुः॥ निर्धन होने पर मनुष्य को उसके मित्र, स्त्री, नौकर और 155 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

हितैषी जन छोड़कर चले जाते हैं, परंतु पुनः धन आने पर फिर से उसी का आश्रय लेते हैं॥5॥ इसका भाव यह है कि आदमी के जीवन में धन का बड़ा महत्त्व है। धन ही भाई है, धन ही मित्र है और धन ही स्त्री है। अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति। प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति॥ अन्याय से उपार्जित किया गया धन दस वर्ष तक रहता है। ग्यारहवें वर्ष के आते ही जड़ सहित नष्ट हो जाता है॥6॥ अन्यायपूर्वक धन कमाने के लिए व्यक्ति को कभी प्रयास नहीं करना चाहिए। अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम्। अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकर भूषणम्॥ समर्थ व्यक्ति द्वारा किया गया गलत कार्य भी अच्छा कहलाता है और नीच व्यक्ति के द्वारा किया गया अच्छा कार्य भी गलत कहलाता है। ठीक वैसे, जैसे अमरता प्रदान करने वाला अमृत राहु के लिए मृत्यु का कारण बना और प्राणघातक विष भी शंकर के लिए भूषण हो गया॥7॥ भाव यह है कि समर्थ व्यक्ति को दोष नहीं दिया जा सकता। तुलसीदासजी ने भी कहा है—'समरथ को नाहिं दोष गुसाईं।' तद् भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं, तत्सौहृदं यत् क्रियते परस्मिन्। स प्राज्ञता या न करोति पापं, दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः॥ भोजन वही है जो ब्राह्मण के करने के बाद बचा रहता है, भलाई वही है जो दूसरों के लिए की जाती है, बुद्धिमान वही है जो पाप नहीं करता और बिना पाखण्ड तथा दिखावे के जो कार्य किया जाता है, वह धर्म है॥8॥ 156 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

भाव यह है कि ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद ही भोजन करना चाहिए और बिना किसी प्रकार के दिखावे के जो परोपकार किया जाता है, उसे ही सच्चा धर्म मानना चाहिए। मणिलुंठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते। क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः॥ मणि पैरों में पड़ी हो और कांच सिर पर धारण किया गया हो, परंतु क्रय-विक्रय करते समय अर्थात मोल-भाव करते समय मणि मणि ही रहती है और कांच कांच ही रहता है॥9॥ भाव यह है कि समय अथवा भाग्य के कारण विद्वान व्यक्ति का भले ही सम्मान न हो, पर जब मूल्यांकन का समय आता है तो विद्वान की विद्वता को कोई चुनौती नहीं दे सकता। योग्य व्यक्ति की अलग ही पहचान होती है और अयोग्य व्यक्ति की जग-हंसाई ही होती है। अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥ शास्त्रों का अंत नहीं है, विद्याएं बहुत हैं, जीवन छोटा है, विघ्न-बाधाएं अनेक हैं। अतः जो सार तत्त्व है, उसे ही ग्रहण करना चाहिए, जैसे हंस जल के बीच से दूध को पी लेता है॥10॥ मानव जीवन बहुत छोटा है और इस संसार में ज्ञान अपरिमित है। पूरे जीवन में सारे ज्ञान को नहीं पाया जा सकता इसलिए ज्ञान के उस सार तत्त्व को ग्रहण करना चाहिए जो सत्य है। दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा गृहमागतम्। अनर्चयित्वा यो भुंक्ते स वै चाण्डाल उच्यते॥ अचानक दूर से आए थके-हारे पथिक से बिना पूछे ही 157 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

जो स्वयं भोजन कर लेता है, वह चाण्डाल होता है॥11॥ भाव यह है कि अतिथि को भारतीय संस्कृति में देवता समान माना गया है। जो व्यक्ति अतिथि से पूछे बिना अर्थात् उसका आदर-सत्कार किए बिना ही भोजन कर लेता है, वह किसी नीच से कम नहीं। पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा॥ बुद्धिहीन ब्राह्मण वैसे तो चारों वेदों और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, पर आत्मज्ञान को वे नहीं समझ पाते या उसे समझने का प्रयास ही नहीं करते। ऐसे ब्राह्मण उस कलछी की तरह होते हैं, जो तमाम व्यंजनों में तो चलती है, पर रसोई के रस को नहीं जानती॥12॥ भाव यह है कि वेद-शास्त्रों के अध्ययन की सार्थकता तभी है, जब उनके मर्म को समझा जाए और आत्मज्ञान को जाना जाए कि आत्मा क्या है? उसका परमात्मा से क्या संबंध है? जब तक यह नहीं जाना जाएगा, तब तक किसी भी प्रकार का ज्ञान व्यर्थ है। धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे। तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः॥ इस संसार सागर को पार करने के लिए ब्राह्मण रूपी नौका प्रशंसा के योग्य है, जो उल्टी दिशा की ओर बहती है। इस नाव में ऊपर बैठने वाले पार नहीं होते, किंतु नीचे बैठने वाले पार हो जाते हैं। अतः सदा नम्रता का ही व्यवहार करना चाहिए॥13॥ 158