सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखनित्वा हि खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥ जिस प्रकार फावड़े अथवा कुदाल से खोदकर व्यक्ति धरती के नीचे से जल प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार एक शिष्य गुरु की मन से सेवा करके विद्या प्राप्त कर लेता है।।16।। सेवा और कठोर श्रम से ही फल प्राप्त होता है। बिना साधना के सेवा भी व्यर्थ हो जाती है। अतः सेवा के साथ-साथ कठोर परिश्रम भी आवश्यक है। विद्या प्राप्त करने के लिए गुरु की सेवा करनी चाहिए, तभी शिक्षा की प्राप्ति होती है। कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी। तथापि सुधियश्चाऽऽर्या सुविचार्यैव कुर्वते॥ फल कर्म के अधीन है, बुद्धि कर्म के अनुसार होती है, तब भी बुद्धिमान लोग और महान लोग सोच-विचार करके ही कोई कार्य करते हैं।।17।। किसी भी कार्य को करने से पूर्व अच्छी प्रकार से सोच-समझ लेना चाहिए, तभी कार्य अच्छे होते हैं। संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में संतोष करना चाहिए और विद्या पढ़ने, जप करने और दान देने, इन तीनों में संतोष नहीं करना चाहिए।।18।। भाव यह है कि दान, ईश्वर ध्यान और स्वाध्याय, इनमें कभी भी कंजूसी नहीं करनी चाहिए। जी भरकर दान देना चाहिए और पूर्ण मनोयोग से ईश्वर की आराधना और शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। 144 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—9