सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'संतोष सबसे बड़ा धन है। सुख और दुःख में उसे समरस रहना चाहिए। कहा भी है- 'जाहि विध राखे राम, ताहि विध रहिए।' ।।13।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से कहा है कि संतोष ही सुख का मूल है, अतः संतोष धारण करना चाहिए। संतोष से बढ़कर कोई और सुख नहीं होता। सुख के इच्छुक को संतोष का सहारा लेकर अपने-आपको संयम में रखना चाहिए। असंतोष दुख का कारण है। यथा धेनुसहस्रेषु वस्तो गच्छति मारतम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥ जैसे हजारों गायों के मध्य भी बछड़ा अपनी ही माता के पास आता है, उसी प्रकार किए गए कर्म कर्ता के पीछे-पीछे जाते हैं।।14।। आदमी जैसे कर्म करता है, उसे फल भी उसी के कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं। अतः सदैव अच्छे कर्म करके अपना जीवन सुधारना चाहिए। अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम्। जने दहति संसर्गो वने संगविवर्जनम्॥ अव्यवस्थित कार्य करने वाले को न तो समाज में और न वन में सुख प्राप्त होता है क्योंकि समाज में लोग उसे भला-बुरा कहकर जलाते हैं और निर्जन वन में अकेला होने के कारण वह दुःखी होता है।।15।। भाव यह है कि ऐसे व्यक्ति को न तो घर में सुख मिलता है, न संन्यास लेने पर सुख प्राप्त होता है। सच्चा सुख कर्तव्य पथ का निश्चय करके, उस पर चलने में है। 143