भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 196 में से

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एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिवन्दति। श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते॥ जिस गुरु ने एक भी अक्षर पढ़ाया हो, उस गुरु को जो प्रणाम नहीं करता अर्थात उसका सम्मान नहीं करता, ऐसा व्यक्ति कुत्ते की सैकड़ों योनियों को भुगतने के उपरान्त चाण्डाल योनि में जन्म लेता है॥19॥ गुरु का सम्मान करना अत्यन्त आवश्यक है। गुरु का स्थान गोविन्द से भी बड़ा होता है। युगान्ते प्रचलते मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः। साधवः प्रतिपन्नार्थान् न चलन्ति कदाचन॥ प्रलय काल में चाहे मेरु पर्वत डगमगा जाए और कल्प के अन्त में सातों सागर चाहे अपनी मर्यादा छोड़ दें, परंतु महान विभूतियां, श्रेष्ठ साधु अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होते॥20॥ भाव यह है कि बड़े लोगों के सम्मुख कितनी ही विपत्तियां क्यों न आ जाएं, वे अपने लक्ष्य से कभी भी विचलित नहीं होते। जो सोच लेते हैं, उसे करके ही हटते हैं। वे कभी अपनी मान्यताओं, अपने सिद्धान्तों, अपने आदर्शों और अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटते। उनका मार्ग परजन हितकारी होता है और वे जीवन-भर उसी पर चलते रहते हैं। 145

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