सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽऽअथ चतुर्दश अध्याय ऽऽ पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते॥ इस पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं—जल, अन्न और मधुर वचन! बुद्धिमान व्यक्ति इनकी समझ रखता है, परंतु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं॥1॥ जल और अन्न के बिना आदमी का जीवन बिल्कुल भी संभव नहीं है और मधुर वचनों के बिना समाज में विचरण करना मुश्किल है। कटु वचन कहने वाले का कोई भी आदर नहीं करता। दारिद्र्यरोधदुःखानि बंधनव्यसनानि च। आत्माऽपराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्॥ मनुष्य के अधर्मरूपी वृक्ष (अर्थात शरीर) के फल—दरिद्रता, रोग, दुःख, बंधन (मोह-माया), व्यसन आदि हैं॥2॥ मनुष्य यदि अधर्म के मार्ग पर चलता है तो उसे अपने जीवन में उपर्युक्त दुःखों का सामना करना पड़ता है। 146 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri