भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

पुनर्वितं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही। एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥ धन, मित्र, स्त्री और पृथ्वी, ये बार-बार प्राप्त होते हैं, परंतु मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता॥3॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मानव शरीर का महत्त्व बताया है। उनके अनुसार मानव शरीर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त ही प्राप्त होता है। यह अत्यन्त दुर्लभ है। इसमें ईश्वर को स्मरण किया जा सकता है। बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुंजयः। वर्षधाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते॥ यह एक निश्चित तथ्य है कि बहुत-से लोगों का समूह ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है, जैसे वर्षा की धार को धारण करने वाले मेघों के जल को तिनकों के द्वारा (तिनके का बना छप्पर) ही रोका जा सकता है॥4॥ भाव यह है कि एकता में बड़ा बल होता है। वह बड़ी-से-बड़ी शक्ति से टकरा सकता है। जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि। प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः॥ पानी में तेल, दुष्ट व्यक्तियों में गोपनीय बातें, उत्तम पात्र को दिया गया दान और बुद्धिमान के पास शास्त्र-ज्ञान यदि थोड़ा भी हो तो स्वयं वह अपनी शक्ति से विस्तार पा जाता है॥5॥ भाव यह है कि जिस प्रकार पानी में डाला गया जरा-सा तेल भी फैल जाता है, दुष्टों में पहुंची गोपनीय बातें चारों तरफ फैल जाती हैं, उसी प्रकार उत्तम पात्र को दिया गया दान बहुत परोपकार 147 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri