सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरता है और बुद्धिमान का थोड़ा-सा शास्त्र ज्ञान भी काफी लोगों को प्रबुद्ध करता है। ज्ञान का विस्तार इसी प्रकार होता है, अर्थात सभी चीजों का अपना-अपना महत्त्व है। धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्। सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत् को न मुच्येत बंधनात्॥ धार्मिक कथा सुनने पर, श्मशान में चिता को जलते देखकर, रोगी को कष्ट में पड़े देखकर जिस प्रकार वैराग्य भाव उत्पन्न होता है, वह यदि स्थिर रहे तो यह सांसारिक मोह-माया व्यर्थ लगने लगे, परंतु अस्थिर मन श्मशान से लौटने पर फिर से मोह-माया में फंस जाता है॥6॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने सांसारिक मोह-माया से बचने के लिए मन को दृढ़ बनाने की बात कही है। उनके अनुसार अस्थिर मन से संसार से विमुक्त होने की कामना करना कभी सुखकारी नहीं होता। उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी। तादृशी यदि पूर्व स्यात् कस्य न स्यान्महोदयः॥ चिंता करने वाले व्यक्ति के मन में चिंता उत्पन्न होने के बाद की जो स्थिति होती है अर्थात उसकी जैसी बुद्धि हो जाती है, वैसी बुद्धि यदि पहले से ही रहे तो भला किसका भाग्योदय नहीं होगा।।7।। इस श्लोक में चाणक्य ने बताया है कि गलत कार्य करने के उपरान्त पश्चाताप के समय उसकी जैसी निर्मल बुद्धि हो जाती है, यदि वैसी निर्मल बुद्धि पहले से ही रहे तो भला किसका कल्याण नहीं होगा। 148