भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

करता है और बुद्धिमान का थोड़ा-सा शास्त्र ज्ञान भी काफी लोगों को प्रबुद्ध करता है। ज्ञान का विस्तार इसी प्रकार होता है, अर्थात सभी चीजों का अपना-अपना महत्त्व है। धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्। सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत् को न मुच्येत बंधनात्॥ धार्मिक कथा सुनने पर, श्मशान में चिता को जलते देखकर, रोगी को कष्ट में पड़े देखकर जिस प्रकार वैराग्य भाव उत्पन्न होता है, वह यदि स्थिर रहे तो यह सांसारिक मोह-माया व्यर्थ लगने लगे, परंतु अस्थिर मन श्मशान से लौटने पर फिर से मोह-माया में फंस जाता है॥6॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने सांसारिक मोह-माया से बचने के लिए मन को दृढ़ बनाने की बात कही है। उनके अनुसार अस्थिर मन से संसार से विमुक्त होने की कामना करना कभी सुखकारी नहीं होता। उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी। तादृशी यदि पूर्व स्यात् कस्य न स्यान्महोदयः॥ चिंता करने वाले व्यक्ति के मन में चिंता उत्पन्न होने के बाद की जो स्थिति होती है अर्थात उसकी जैसी बुद्धि हो जाती है, वैसी बुद्धि यदि पहले से ही रहे तो भला किसका भाग्योदय नहीं होगा।।7।। इस श्लोक में चाणक्य ने बताया है कि गलत कार्य करने के उपरान्त पश्चाताप के समय उसकी जैसी निर्मल बुद्धि हो जाती है, यदि वैसी निर्मल बुद्धि पहले से ही रहे तो भला किसका कल्याण नहीं होगा। 148

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्त्तव्यो बहुरत्ना वसुंधरा॥ दान, तपस्या, वीरता, ज्ञान, नम्रता, किसी में ऐसी विशेषता को देखकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में ऐसे अनेक रत्न भरे पड़े हैं॥8॥ भाव यह है कि दुनिया में एक से बढ़कर एक व्यक्ति ऐसे हैं जो दान, तप, वीरता, ज्ञान और संवेदनशीलता में बढ़े-चढ़े हैं। कहां तक आश्चर्य किया जा सकता है। दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः। यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः॥ जो जिसके मन में है, वह उससे दूर रहकर भी दूर नहीं है और जो जिसके हृदय में नहीं है, वह समीप रहते हुए भी दूर है॥9॥ भाव यह है कि सच्चा प्रेम हृदय से होता है, उसमें दूरी का अथवा पास का कोई व्यवधान नहीं होता। सच्चे प्रेम में प्रिय हर समय आंखों के सम्मुख ही रहता है। यस्य चाप्रियमिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्। व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम्॥ जिससे अपना हित साधना हो, उससे सदैव प्रिय बोलना चाहिए जैसे मृग को मारने के लिए बहेलिया मीठे स्वर में गीत गाता है॥10॥ यहां चाणक्य ने कूटनीति की ओर इशारा किया है कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए राजा को सदैव अपने शत्रु से मीठा-व्यवहार करना चाहिए। उससे मधुर-वाणी में बात करनी चाहिए। 149

अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः। सेव्यन्ता मध्यभागेन वह्निन्गुरुः स्त्रियः॥ राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री, इनसे सामान्य व्यवहार करना चाहिए क्योंकि अत्यंत समीप होने पर ये नाश के कारण होते हैं और दूर रहने पर इनसे कोई फल प्राप्त नहीं होता।।11।। भाव यह है कि इनसे व्यवहार करते समय मध्यम मार्ग अपनाएं। 'न नीम से कड़वा और न गुड़ से मीठा।' ज्यादा दूरी भी नहीं और ज्यादा पास भी नहीं। अग्निरापः स्त्रियो मूर्खः सर्पा राजकुलानि च। नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट्॥ अग्नि, पानी, स्त्रियां, मूर्ख, सांप और राजाकुल से निकट संबंध सावधानी के साथ करना चाहिए क्योंकि ये छः तत्काल प्राणों को हरने वाले हैं।। 12।। प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने अग्नि, पानी, स्त्रियां, मूर्ख, सांप और राजवंश से सतर्क रहने की बात कही है। उनके अनुसार अग्नि के प्रति, जल के प्रति, स्त्री के प्रति, मूर्ख व्यक्ति के प्रति, सर्प के प्रति और राजवंश के प्रति यदि जरा भी असावधानी दिखाई तो प्राण संकट में पड़ सकते हैं। इनसे बहुत सावधान रहना चाहिए। स जीवति गुना यस्य यस्य धर्मः स जीवति। गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम्॥ जिसके पास गुण हैं, जिसके पास धर्म है, वही जीवित है। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निरर्थक है।। 13।। चाणक्य ने मनुष्य में गुण के उपस्थित होने पर बल दिया है। गुण से तात्पर्य दयाभाव, जगत-कल्याण की भावना तथा परोपकार है। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 150

यदीच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा। पंचदशास्येभ्यो गां चरन्ती निवारय॥ यदि एक ही कर्म से समस्त संसार को वश में करना चाहते हो तो पंद्रह मुखों से विचरण करने वाले मन को रोको, अर्थात उसे वश में करो। पंद्रह मुख हैं—मुंह, आंख, कान, नाक, जीभ, त्वक्, हाथ, पैर, लिंग, गुदा, रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द।।14। कहीं-कहीं इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में 'परापवादशस्येभ्यो' शब्द भी मिलता है, तब इसका अर्थ 'परनिन्दा' हो जाएगा। तब अर्थ होगा—'यदि एक ही कर्म से सारे संसार को वश में करना चाहते हो तो परनिन्दा करना बंद कर दो। मन को वश में करना और परनिन्दा न करना, दोनों ही उचित लगते हैं। ऐसा करके आपके हाथों में वशीकरण मंत्र की शक्ति आ सकती है। प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम्। आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पंडितः॥ जो प्रस्ताव के योग्य बातों को, प्रभाव के अनुसार प्रिय कार्य को या वचन को और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है।।15।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में बताया है कि प्रसंग अनुकूल बात करनी चाहिए, यदि प्रसन्नता का मौका है तो उसमें प्रसन्नता की बातें होनी चाहिए। इसी तरह अन्य योग्यताओं का वर्णन किया है। एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः। कुणपः कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥ एक ही वस्तु को तीन दृष्टियों से देखा जा सकता है। जैसे सुंदर स्त्री को योगी मृतक के रूप में देखता है, कामुक व्यक्ति उसे 151 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

कामिनी के रूप में देखता है और कुत्ते के द्वारा वह मांस के रूप में देखी जाती है।। 16।। भाव यह है कि नारी का सौंदर्य दृष्टि भ्रममात्र है। प्रत्येक व्यक्ति हर चीज को अपनी-अपनी दृष्टि से देखता है। सुसिद्धमौषधं धर्म गृहच्छिद्रं च मैथुनम्। कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ बुद्धिमान वही है जो अति सिद्ध दवा को, धर्म के रहस्य को, घर के दोष को, मैथुन अर्थात संभोग की बात को, स्वादहीन भोजन को और अतिकष्टकारी मृत्यु को किसी को न बताए। भाव यह है कि कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें समाज में छिपाकर ही रखना चाहिए।। 17।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से इस बात को बताया है कि छुपाने योग्य बातों को न छुपाकर मनुष्य समाज में हंसी का पात्र बनता है, कुछ मामलों में नुकसान उठाता है। तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः। यावत्सर्वजनानन्द दायिनी वाक् न प्रवर्तते॥ कोयल की वाणी तभी तक मौन रहती है, जब तक कि सभी जनों को आनन्द देने वाली वाणी प्रारम्भ नहीं हो जाती।। 18।। भाव यह है कि आम्रमंजरी के फूलने के बाद ही कोयल कूकती है क्योंकि आम्रमंजरी की भीनी सुगंध से आनन्दित होकर वसंत ऋतु में लोगों की मीठी वाणी भी चहकने लगती है। धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्। सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति॥ धर्म, धन, अन्न, गुरु का उपदेश और गुणकारी औषधि का संग्रह अच्छी प्रकार से करना चाहिए। अन्यथा जीवन का 152

कल्याण नहीं होता। जीवन नष्ट हो जाता है।।19।। बिना धर्म और गुरु उपदेश के मानसिक सुख मृतप्राय है और बिना अन्न और धन के जीवन का भौतिक आधार नष्ट हो जाता है। त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्। कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥ दुष्टों का साथ त्यागो, सज्जनों का साथ करो, रात-दिन धर्म का आचरण करो और प्रतिदिन इस अनित्य संसार में नित्य परमात्मा के विषय में विचार करो, उसे स्मरण करो।।20।। सद्‍संगति और धर्माचरण करते हुए नित्य परमात्मा को याद करना चाहिए और इस संसार की नश्वरता को समझना चाहिए। सद्‍संगति के सामने दुष्टों का साथ कुछ भी नहीं है। 153

॥ अथ पंचदश अध्याय ॥ यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु। तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः॥ जिसका हृदय सभी प्राणियों पर दया करने हेतु द्रवित हो उठता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटा और भस्म लगाने की क्या जरूरत है ?।।1।। भाव यह है कि हमें सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए, उनसे स्नेह करना चाहिए। जो ऐसा करता है, उसका स्थान परमात्मा के समकक्ष हो जाता है। एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्। पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा चाऽनृणी भवेत्॥ जो गुरु एक ही अक्षर अपने शिष्य को पढ़ा देता है, उसके लिए इस पृथ्वी पर कोई अन्य चीज ऐसी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जिसे वह गुरु को देकर उऋण हो सके ।।2।। भाव यह है कि जो गुरु अपने शिष्य को एक अक्षर का यह उपदेश दे देता है— 'तत्त्वमसि' अर्थात 'तुम ब्रह्म हो।' आत्मा तुम्हारा ही रूप है, अंश है। यह शरीर तो नाशवान है, अनित्य 154

है, जबकि ब्रह्म 'नित्य' है, अजन्मा है, सदैव से है और अनन्त काल तक रहेगा। उसका कोई ओर-छोर नहीं, तो यह उपदेश पाने के बाद शिष्य के लिए किसी अन्य उपदेश को पाने की आवश्यकता नहीं रह जाती। खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया। उपानान्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्॥ दुष्टों और कांटों से बचने के दो ही उपाय हैं, जूतों से उन्हें कुचल डालना व उनसे दूर रहना॥३॥ भाव यह है कि दुष्ट और कांटे सदैव कष्ट ही पहुंचाने वाले होते हैं। इनसे बचकर रहना ही ठीक रहता है। यदि इनसे सामना हो ही जाए तो इन्हें जूतों से कुचल डालना चाहिए। कुचैलिनं दंतमलोपसृष्टं, बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं च। सूर्योदये चास्तमिते शयानं, विमुंचति श्रीर्यदि चक्रपाणिः॥ गंदे वस्त्र धारण करने वाले, दांतों पर मैल जमाए रखने वाले, अत्यधिक भोजन करने वाले, कठोर वचन बोलने वाले, सूर्योदय से सूर्यास्त तक सोने वाले को, चाहे वह साक्षात विष्णु ही क्यों न हो, लक्ष्मी त्याग देती है॥4॥ ऐसे व्यक्ति आलसी, कामचोर, पेटू, क्रोधी और निकम्मे होते हैं। ऐसे लोगों के पास धन-सम्पति कभी नहीं आती। यदि आती भी है तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, परंतु जो व्यक्ति स्वच्छ रहेगा, कर्मठ होगा, वही धन-वैभव जुटाने में कामयाब होता है। त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं, दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च। तं चार्थवन्तं पुनराश्रयंते, अर्थो हि लोके पुरुषस्य बंधुः॥ निर्धन होने पर मनुष्य को उसके मित्र, स्त्री, नौकर और 155 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

हितैषी जन छोड़कर चले जाते हैं, परंतु पुनः धन आने पर फिर से उसी का आश्रय लेते हैं॥5॥ इसका भाव यह है कि आदमी के जीवन में धन का बड़ा महत्त्व है। धन ही भाई है, धन ही मित्र है और धन ही स्त्री है। अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति। प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति॥ अन्याय से उपार्जित किया गया धन दस वर्ष तक रहता है। ग्यारहवें वर्ष के आते ही जड़ सहित नष्ट हो जाता है॥6॥ अन्यायपूर्वक धन कमाने के लिए व्यक्ति को कभी प्रयास नहीं करना चाहिए। अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम्। अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकर भूषणम्॥ समर्थ व्यक्ति द्वारा किया गया गलत कार्य भी अच्छा कहलाता है और नीच व्यक्ति के द्वारा किया गया अच्छा कार्य भी गलत कहलाता है। ठीक वैसे, जैसे अमरता प्रदान करने वाला अमृत राहु के लिए मृत्यु का कारण बना और प्राणघातक विष भी शंकर के लिए भूषण हो गया॥7॥ भाव यह है कि समर्थ व्यक्ति को दोष नहीं दिया जा सकता। तुलसीदासजी ने भी कहा है—'समरथ को नाहिं दोष गुसाईं।' तद् भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं, तत्सौहृदं यत् क्रियते परस्मिन्। स प्राज्ञता या न करोति पापं, दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः॥ भोजन वही है जो ब्राह्मण के करने के बाद बचा रहता है, भलाई वही है जो दूसरों के लिए की जाती है, बुद्धिमान वही है जो पाप नहीं करता और बिना पाखण्ड तथा दिखावे के जो कार्य किया जाता है, वह धर्म है॥8॥ 156 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

भाव यह है कि ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद ही भोजन करना चाहिए और बिना किसी प्रकार के दिखावे के जो परोपकार किया जाता है, उसे ही सच्चा धर्म मानना चाहिए। मणिलुंठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते। क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः॥ मणि पैरों में पड़ी हो और कांच सिर पर धारण किया गया हो, परंतु क्रय-विक्रय करते समय अर्थात मोल-भाव करते समय मणि मणि ही रहती है और कांच कांच ही रहता है॥9॥ भाव यह है कि समय अथवा भाग्य के कारण विद्वान व्यक्ति का भले ही सम्मान न हो, पर जब मूल्यांकन का समय आता है तो विद्वान की विद्वता को कोई चुनौती नहीं दे सकता। योग्य व्यक्ति की अलग ही पहचान होती है और अयोग्य व्यक्ति की जग-हंसाई ही होती है। अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥ शास्त्रों का अंत नहीं है, विद्याएं बहुत हैं, जीवन छोटा है, विघ्न-बाधाएं अनेक हैं। अतः जो सार तत्त्व है, उसे ही ग्रहण करना चाहिए, जैसे हंस जल के बीच से दूध को पी लेता है॥10॥ मानव जीवन बहुत छोटा है और इस संसार में ज्ञान अपरिमित है। पूरे जीवन में सारे ज्ञान को नहीं पाया जा सकता इसलिए ज्ञान के उस सार तत्त्व को ग्रहण करना चाहिए जो सत्य है। दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा गृहमागतम्। अनर्चयित्वा यो भुंक्ते स वै चाण्डाल उच्यते॥ अचानक दूर से आए थके-हारे पथिक से बिना पूछे ही 157 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

जो स्वयं भोजन कर लेता है, वह चाण्डाल होता है॥11॥ भाव यह है कि अतिथि को भारतीय संस्कृति में देवता समान माना गया है। जो व्यक्ति अतिथि से पूछे बिना अर्थात् उसका आदर-सत्कार किए बिना ही भोजन कर लेता है, वह किसी नीच से कम नहीं। पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा॥ बुद्धिहीन ब्राह्मण वैसे तो चारों वेदों और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, पर आत्मज्ञान को वे नहीं समझ पाते या उसे समझने का प्रयास ही नहीं करते। ऐसे ब्राह्मण उस कलछी की तरह होते हैं, जो तमाम व्यंजनों में तो चलती है, पर रसोई के रस को नहीं जानती॥12॥ भाव यह है कि वेद-शास्त्रों के अध्ययन की सार्थकता तभी है, जब उनके मर्म को समझा जाए और आत्मज्ञान को जाना जाए कि आत्मा क्या है? उसका परमात्मा से क्या संबंध है? जब तक यह नहीं जाना जाएगा, तब तक किसी भी प्रकार का ज्ञान व्यर्थ है। धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे। तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः॥ इस संसार सागर को पार करने के लिए ब्राह्मण रूपी नौका प्रशंसा के योग्य है, जो उल्टी दिशा की ओर बहती है। इस नाव में ऊपर बैठने वाले पार नहीं होते, किंतु नीचे बैठने वाले पार हो जाते हैं। अतः सदा नम्रता का ही व्यवहार करना चाहिए॥13॥ 158

इस श्लोक का भाव यही है कि जो लोग ब्राह्मणों के प्रति नम्र रहते हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनका उद्धार हो जाता है, किन्तु जो ब्राह्मण के सम्मुख अपने बड़प्पन का रोब झाड़ते हैं, अपना अहंकार प्रदर्शित करते हैं, उनका उद्धार कभी नहीं हो पाता। अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनां, कमलासहजातः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः। भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः, परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति॥ पराए घर में रहने से कौन छोटा नहीं हो जाता? यह देखो अमृत का खजाना, औषधियों का स्वामी, श्री और शोभा से युक्त यह चन्द्रमा, जब सूर्य के प्रभा-मंडल में आता है तो प्रकाशहीन हो जाता है॥14॥ दूसरों की पराधीनता में जाने से आदमी का स्वाभिमान नष्ट हो जाता है। अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः। विधिवशात् परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते॥ कुमुदिनी के पत्तों के मध्य विकसित उसके पराग कणों से मस्त हुआ भौंरा, जब भाग्यवश किसी दूसरी जगह पर जाता है तो वहां मिलने वाले कटसरैया के फूलों के रस को भी अधिक महत्त्व देने लगता है॥15॥ इस पद का भाव यह है कि परदेश सुखकर नहीं होता। परदेश में भौंरे की भांति आदमी को अनेक कष्टों को झेलना पड़ता है। वहां जो मिल जाए, उसी पर संतोष करना पड़ता है। 159 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

पीतः क्रुद्धेन तातश्चरणतलहतो वल्लभो येन रोषाद् आबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे। गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिवसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्माति खिन्ना सदाहं द्विजकुलनिलयं नाथ! युक्तं त्यजामि॥ लक्ष्मी भगवान विष्णु से कहती है 'हे नाथ! ब्राह्मण वंश के आगस्त्य ऋषि ने मेरे पिता (समुद्र) को क्रोध से पी लिया, विप्रवर भृगु ने मेरे परमप्रिय स्वामी (श्री विष्णु) की छाती में लात मारी, बड़े-बड़े ब्राह्मण विद्वानों ने बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक मेरी शत्रु सरस्वती को अपनी वाणी में धारण किया और ये (ब्राह्मण) उमापति (शंकर) की पूजा के लिए प्रतिदिन हमारा घर (श्रीफल पत्र आदि) तोड़ते हैं। हे नाथ ! इन्हीं कारणों से सदैव दुःखी मैं आपके साथ रहते हुए भी ब्राह्मण के घर को छोड़ देती हूं।' ।।16।। प्रस्तुत पंक्तियों में लक्ष्मी का संवाद विष्णु के साथ कराया गया है और उस कारण को बताया गया है, जिसकी वजह से लक्ष्मी ब्राह्मणों के घर में नहीं रहतीं। ब्राह्मणों से मानो उनका वैर है क्योंकि ब्राह्मणों (अगस्त्य ऋषि) ने समुद्र (जिससे कि उनकी उत्पत्ति हुई) को पी डाला, (भृगु ऋषि ने) भगवान विष्णु (उनके पति) को लात मारी और उनकी सौत सरस्वती को गले लगाया है, अर्थात विद्या ही सबसे बड़ा धन है। बंधनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुदृढ बंधमन्यत्। दारुभेदनिपुणोऽपि षडंघ्रिर निष्क्रियो भवति पंकजकोशे॥ यह निश्चय है कि बंधन अनेक हैं, परंतु प्रेम का बंधन निराला है। देखो, लकड़ी को छेदने में समर्थ भौंरा कमल की पंखुड़ियों में उलझकर क्रियाहीन हो जाता है, अर्थात प्रेम रस से मस्त 160 CC0 Vasistha Tripathi Collection, Digitized by eGangotri सम्पूर्ण चाणक्य नीति-10

हुआ भौंरा कमल की पंखुड़ियों को नष्ट करने में समर्थ होते हुए भी उसमें छेद नहीं कर पाता।।17।। इस श्लोक में राजनीति के पंडित आचार्य चाणक्य ने दर्शाया है कि प्रेम का बंधन अटूट है। उसे तोड़ना अत्यन्त कठिन है। जो प्राणी इस संसार के माया-मोह में फंस जाता है वह भौंरे की तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार भौंरा कमल के मोह में फंसकर उसकी पंखुड़ियों में कैद होकर अपना जीवन गंवा देता है। छिन्नोऽपि चन्दनतरुर्न जहाति गन्धम्, वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम्। यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः, क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः॥ चन्दन का कटा हुआ वृक्ष भी सुगंध नहीं छोड़ता, बूढ़ा होने पर भी गजराज क्रीड़ा नहीं छोड़ता, ईख कोल्हू में पिसने के बाद भी अपनी मिठास नहीं छोड़ती और कुलीन व्यक्ति दरिद्र होने पर भी सुशीलता आदि गुणों को नहीं छोड़ता।।18।। भाव यह है कि जन्म से ही जो शाश्वत गुण मनुष्य को प्राप्त होते हैं, वे अंत तक साथ नहीं छोड़ते। उर्व्यां कोऽपि महीधरो लघुत्तरो दोर्भ्यां धृतो लीलया, तेन त्वं दिवि भूतले च सततं गोवर्धनो गीयसे। त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रेण तद्गण्यते, किं या केशव भाषणेन बहुना पुण्यैर्यशो लभ्यते॥ श्रीकृष्ण को उलाहना देती हुई गोपी कहती है कि हे कन्हैया! तुमने एक बार गोवर्धन नामक पर्वत को क्या उठा लिया 161 CC0 Vasistha Tripathi Collection Digitized by eGangotri

कि तुम इस लोक में ही नहीं, परलोक में भी गोवर्धनधारी के रूप में प्रसिद्ध हो गए, परंतु आश्चर्य तो इस बात का है कि मैं तीनों लोकों के स्वामी अर्थात् तुम्हें अपने हृदय पर धारण किए रहती हूं और रात-दिन मैं तुम्हारी चिन्ता करती हूं, पर मुझे कोई त्रिलोकधारी जैसी पदवी नहीं देता।।19।। भाव यह है कि यश-सम्मान तो पुण्य और भाग्य से ही प्राप्त होता है।

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॥ अथ षोडश अध्याय ॥

न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये, स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः। नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नालिंगितं, मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम्॥ संसार से उद्धार के लिए जिन लोगों ने विधिपूर्वक परमेश्वर का ध्यान नहीं किया, स्वर्ग में समर्थ धर्म का उपार्जन नहीं किया, स्वप्न में भी किसी सुंदर युवती के कठोर स्तनों और जंघाओं के आलिंगन का भोग नहीं किया, ऐसे व्यक्ति का जन्म माता के यौवन रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान है॥1॥ भाव यह है कि जिन लोगों ने न तो इस भौतिक संसार का ही उपयोग किया और न परलोक को सुधारने के लिए ईश्वरोपासना तथा धर्म का ही संग्रह किया, ऐसे लोगों को जन्म देना माता के लिए व्यर्थ ही हुआ। सफलता तो तभी मिलती है, जब इस लोक में सुख उठाते हुए परलोक-सुधार के लिए धर्माचरण किया जाए।

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अध्याय १६-१७ एवं चाणक्य राजनीति सूत्र

जल्पन्ति सार्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः। हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः॥ आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलटा (चरित्रहीन) स्त्रियों का प्रेम एकान्तिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है कि कुलटा स्त्रियां पराए व्यक्ति से बातचीत करती हैं, कटाक्षपूर्वक देखती हैं और अपने हृदय में पर पुरुष का चिन्तन करती हैं, इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है॥२॥ आचार्य चाणक्य ने यहां पर कुलटा स्त्रियों के हाव-भाव और चरित्र का स्पष्ट वर्णन किया है। यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा शकुन्तवत्॥ जो मूर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर खेल की चिड़िया की भांति इधर-से-उधर नाचता फिरता है॥३॥ आचार्य चाणक्य का मत है कि प्रायः स्त्रियां विलासिनी होती हैं जो पुरुषों को अपनी ओर आकृष्ट करके उन्हें मनमाना नाच नचाती हैं। कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः, स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः। कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्। को वा दुर्जन वागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पथि॥ आचार्य चाणक्य का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही मोह-माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। 164 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

उनका कहना है—'धन-वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो इस संसार में अहंकारी न हुआ हो, ऐसा कौन-सा व्यभिचारी है, जिसके पापों को परमात्मा ने नष्ट न कर दिया हो, इस पृथ्वी पर ऐसा कौन धीर पुरुष है, जिसका मन स्त्रियों के प्रति व्याकुल न हुआ हो, ऐसा कौन पुरुष है, जिसे मृत्यु ने न दबोचा हो, ऐसा कौन-सा भिखारी है जिसे बड़प्पन मिला हो, ऐसा कौन-सा दुष्ट है जो अपने संपूर्ण दुर्गुणों के साथ इस संसार से कल्याण-पथ पर अग्रसर हुआ हो।'।।4।। भाव यह है कि इस नश्वर संसार की मोह-माया से छूटना अत्यन्त ही दुष्कर कार्य है। न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरंगः। तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः॥ स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी और ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था, तब भी श्रीराम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग) की इच्छा हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े। किसी ने ठीक ही कहा है—'विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।।5।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि विनाश आने से पहले बुद्धि उलटी जाती है। गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः। प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥ आचार्य चाणक्य का मत है कि व्यक्ति अपने गुणों से ही ऊपर उठता है। ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से ही ऊंचा नहीं हो जाता। 165

उदाहरण के लिए महल की चोटी पर बैठ जाने से कौआ क्या गरुड़ बन जाएगा?॥6॥ कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति अपने गुणों से ही महान् बनता है और सभी जगह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। केवल स्थान से व्यक्ति की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती। बल्कि पद पर किसी गुणहीन व्यक्ति के बैठ जाने से उस पद की गरिमा ही गिरती है। गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः। पूर्णेन्दु किं तथा वन्द्यो निष्कलंको यथा कृशः॥ गुणों की सभी जगह पूजा होती है, न कि बड़ी सम्पत्तियों की। क्या पूर्णिमा के चांद को उसी प्रकार से नमन नहीं करते, जैसे द्वितीया के चांद को?॥7॥ भाव यह है कि चन्द्रमा किसी भी रूप में रहे विद्वान व्यक्ति के गुण की भांति उसे हर स्थिति में नमन करते हैं। पर-प्रोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्। इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणः॥ दूसरों के द्वारा गुणों का बखान करने पर बिना गुण वाला व्यक्ति भी गुणी कहलाता है, किन्तु अपने मुख से अपनी बड़ाई करने पर इन्द्र भी छोटा हो जाता है॥8॥ आत्म प्रशंसा से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं कहलाता, अपितु जब दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है, तभी वह गुणी कहलाता है। 'अपने मुंह मियां मिट्ठू' नहीं बनना चाहिए। जिन गुणों की प्रशंसा दूसरे करते हैं, वे ही गुण सच्चे होते हैं। विवेकिनमनुप्राप्ता गुणा यान्ति मनोज्ञताम्। सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम्॥ जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई 166

कार्य सम्पन्न करता है, ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों के मेल से और भी सुंदर हो जाते हैं। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न स्वयं ही अत्यन्त शोभा को प्राप्त हो जाता है।। 9 ।। भाव यह है कि गुण गुणी को ही शोभा पहुंचाते हैं, अविवेकी व्यक्ति को नहीं। उसके पास गुण भी दुर्गुण बन जाते हैं। गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः। अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते।। जो व्यक्ति किसी गुणी व्यक्ति का आश्रित नहीं है, वह व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से युक्त होने पर भी कष्ट झेलता है, जैसे अनमोल श्रेष्ठ मणि को भी सुवर्ण की जरूरत होती है। अर्थात सोने में जड़े जाने के उपरान्त ही उसकी शोभा में चार चांद लग जाते हैं।। 10 ।। भाव यह है कि किसी का आश्रय प्राप्त करके गुणी व्यक्ति अपने गुणों को समाज में स्थापित करने का अवसर प्राप्त कर लेता है, तभी उसे उचित यश और प्रसिद्धि प्राप्त होती है। अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु। शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे।। जो धन अति कष्ट से प्राप्त हो, धर्म का त्याग करने से प्राप्त हो, शत्रुओं के सामने झुकने अथवा समर्पण करने से प्राप्त हो, ऐसा धन हमें नहीं चाहिए।। 11 ।। भाव यह है कि जो धन सत्कर्मों से प्राप्त हो, अच्छे आचरण से प्राप्त हो, बिना किसी दबाव के प्राप्त हो, वही धन श्रेष्ठ होता है और स्वाभिमान के लायक होता है। आत्मसम्मान को नष्ट करने वाले धन की अपेक्षा धन का न ही होना अच्छा है। 167