सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनका कहना है—'धन-वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो इस संसार में अहंकारी न हुआ हो, ऐसा कौन-सा व्यभिचारी है, जिसके पापों को परमात्मा ने नष्ट न कर दिया हो, इस पृथ्वी पर ऐसा कौन धीर पुरुष है, जिसका मन स्त्रियों के प्रति व्याकुल न हुआ हो, ऐसा कौन पुरुष है, जिसे मृत्यु ने न दबोचा हो, ऐसा कौन-सा भिखारी है जिसे बड़प्पन मिला हो, ऐसा कौन-सा दुष्ट है जो अपने संपूर्ण दुर्गुणों के साथ इस संसार से कल्याण-पथ पर अग्रसर हुआ हो।'।।4।। भाव यह है कि इस नश्वर संसार की मोह-माया से छूटना अत्यन्त ही दुष्कर कार्य है। न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरंगः। तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः॥ स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी और ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था, तब भी श्रीराम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग) की इच्छा हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े। किसी ने ठीक ही कहा है—'विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।।5।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि विनाश आने से पहले बुद्धि उलटी जाती है। गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः। प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥ आचार्य चाणक्य का मत है कि व्यक्ति अपने गुणों से ही ऊपर उठता है। ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से ही ऊंचा नहीं हो जाता। 165