सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदाहरण के लिए महल की चोटी पर बैठ जाने से कौआ क्या गरुड़ बन जाएगा?॥6॥ कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति अपने गुणों से ही महान् बनता है और सभी जगह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। केवल स्थान से व्यक्ति की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती। बल्कि पद पर किसी गुणहीन व्यक्ति के बैठ जाने से उस पद की गरिमा ही गिरती है। गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः। पूर्णेन्दु किं तथा वन्द्यो निष्कलंको यथा कृशः॥ गुणों की सभी जगह पूजा होती है, न कि बड़ी सम्पत्तियों की। क्या पूर्णिमा के चांद को उसी प्रकार से नमन नहीं करते, जैसे द्वितीया के चांद को?॥7॥ भाव यह है कि चन्द्रमा किसी भी रूप में रहे विद्वान व्यक्ति के गुण की भांति उसे हर स्थिति में नमन करते हैं। पर-प्रोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्। इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणः॥ दूसरों के द्वारा गुणों का बखान करने पर बिना गुण वाला व्यक्ति भी गुणी कहलाता है, किन्तु अपने मुख से अपनी बड़ाई करने पर इन्द्र भी छोटा हो जाता है॥8॥ आत्म प्रशंसा से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं कहलाता, अपितु जब दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है, तभी वह गुणी कहलाता है। 'अपने मुंह मियां मिट्ठू' नहीं बनना चाहिए। जिन गुणों की प्रशंसा दूसरे करते हैं, वे ही गुण सच्चे होते हैं। विवेकिनमनुप्राप्ता गुणा यान्ति मनोज्ञताम्। सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम्॥ जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई 166