सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्य सम्पन्न करता है, ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों के मेल से और भी सुंदर हो जाते हैं। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न स्वयं ही अत्यन्त शोभा को प्राप्त हो जाता है।। 9 ।। भाव यह है कि गुण गुणी को ही शोभा पहुंचाते हैं, अविवेकी व्यक्ति को नहीं। उसके पास गुण भी दुर्गुण बन जाते हैं। गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः। अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते।। जो व्यक्ति किसी गुणी व्यक्ति का आश्रित नहीं है, वह व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से युक्त होने पर भी कष्ट झेलता है, जैसे अनमोल श्रेष्ठ मणि को भी सुवर्ण की जरूरत होती है। अर्थात सोने में जड़े जाने के उपरान्त ही उसकी शोभा में चार चांद लग जाते हैं।। 10 ।। भाव यह है कि किसी का आश्रय प्राप्त करके गुणी व्यक्ति अपने गुणों को समाज में स्थापित करने का अवसर प्राप्त कर लेता है, तभी उसे उचित यश और प्रसिद्धि प्राप्त होती है। अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु। शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे।। जो धन अति कष्ट से प्राप्त हो, धर्म का त्याग करने से प्राप्त हो, शत्रुओं के सामने झुकने अथवा समर्पण करने से प्राप्त हो, ऐसा धन हमें नहीं चाहिए।। 11 ।। भाव यह है कि जो धन सत्कर्मों से प्राप्त हो, अच्छे आचरण से प्राप्त हो, बिना किसी दबाव के प्राप्त हो, वही धन श्रेष्ठ होता है और स्वाभिमान के लायक होता है। आत्मसम्मान को नष्ट करने वाले धन की अपेक्षा धन का न ही होना अच्छा है। 167