भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला। या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते॥ उस लक्ष्मी (धन) से क्या लाभ जो घर की कुलवधू के समान केवल स्वामी के उपभोग में ही आए। उसे तो उस वेश्या के समान होना चाहिए, जिसका उपयोग सब कर सकें॥12॥ इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि सम्पत्ति, धन-वैभव वही अच्छा रहता है, जिसका उपयोग सभी के हित के लिए होता हो। यदि धन पर कुंडली मारकर एक ही व्यक्ति बैठा रहे और केवल अपने ही स्वार्थ के लिए खर्च करे तो ऐसे धन से कोई लाभ नहीं है। धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु। अतृप्तः प्राणिनः सर्वेयाता यास्यन्ति यान्ति च॥ इस संसार में आज तक किसी को भी प्राप्त धन से, इस जीवन से, स्त्रियों से और खान-पान से पूर्ण तृप्ति कभी नहीं मिली। पहले भी, अब भी और आगे भी इन चीजों से संतोष होने वाला नहीं है। इनका जितना अधिक उपभोग किया जाता है, उतनी ही तृष्णा बढ़ती जाती है।। 13।। मनुष्य की इच्छाएं अनन्त हैं। वे कभी पूरी नहीं होतीं। एक इच्छा के पूरी होते ही दूसरी सामने आकर खड़ी हो जाती है। तात्पर्य यह कि मनुष्य अपने आप से कभी संतुष्ट नहीं होता है। अतः संतोष ही सबसे बड़ा धन है। क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञहोमबलिक्रियाः। न क्षीयते पात्रदानमभयं सर्वदेहिनाम्॥ जीवन की समाप्ति के साथ सभी दान, यज्ञ, होम, बलिक्रिया आदि नष्ट हो जाते हैं, किन्तु श्रेष्ठ सुपात्र को दिया गया 168 CC0 Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri