भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दान और सभी प्राणियों पर अभयदान अर्थात दयादान कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल अमर होता है, सनातन होता है।।14।। अतः सुपात्र को ही दान देना चाहिए और सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। उनकी हत्या नहीं करनी चाहिए। ये दोनों दान कभी नष्ट नहीं होते इसीलिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः। वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयिष्यति॥ तिनका हल्का होता है, तिनके से भी हल्की रुई होती है, रुई से भी हल्का याचक (भिखारी) होता है, तब वायु इसे उड़ाकर क्यों नहीं ले जाती? सम्भवतः इस भय से कि कहीं यह उससे ही भीख न मांगने लगे।।15।। मांगने वाले से सभी डरते हैं कि वह उनसे कुछ मांग न बैठे क्योंकि देना कोई नहीं चाहता। वैसे भी, याचक अर्थात भिखारी निंदा के योग्य ही है। वरं प्राणपरित्यागो मानभंगे जीवनात्। प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभंगे दिने दिने॥ अपमान कराके जीने से तो अच्छा मर जाना है क्योंकि प्राणों के त्यागने से केवल एक ही बार कष्ट होगा, पर अपमानित होकर जीवित रहने से जीवनपर्यन्त दुःख होगा।।16।। भाव यह है कि सम्मानित जीवन ही जीने के योग्य होता है। अपमानित होकर जीने से तो मरना बेहतर है। प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥ मधुर वचन सभी को संतुष्ट करते हैं इसलिए सदैव 169 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri