सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजल्पन्ति सार्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः। हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः॥ आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलटा (चरित्रहीन) स्त्रियों का प्रेम एकान्तिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है कि कुलटा स्त्रियां पराए व्यक्ति से बातचीत करती हैं, कटाक्षपूर्वक देखती हैं और अपने हृदय में पर पुरुष का चिन्तन करती हैं, इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है॥२॥ आचार्य चाणक्य ने यहां पर कुलटा स्त्रियों के हाव-भाव और चरित्र का स्पष्ट वर्णन किया है। यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा शकुन्तवत्॥ जो मूर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर खेल की चिड़िया की भांति इधर-से-उधर नाचता फिरता है॥३॥ आचार्य चाणक्य का मत है कि प्रायः स्त्रियां विलासिनी होती हैं जो पुरुषों को अपनी ओर आकृष्ट करके उन्हें मनमाना नाच नचाती हैं। कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः, स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः। कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्। को वा दुर्जन वागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पथि॥ आचार्य चाणक्य का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही मोह-माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। 164 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri